अक्षरों से डरने वाला 4 साल का हिमांशु अब लिखने लगा अक्षर-संख्या, ‘पोषण भी पढ़ाई भी’ योजना ने बदली जिंदगी

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गौतमबुद्धनगर: जब चार साल का कोई बच्चा पढ़ाई के नाम से ही सहमने लगे और अक्षरों व संख्याओं को पहचानना उसके लिए मुश्किल हो, तो माता-पिता की चिंता स्वाभाविक है। लेकिन सही मार्गदर्शन, स्नेह और खेल-खेल में सीखने का माहौल मिले तो यही डर आत्मविश्वास में बदल सकता है। गौतमबुद्धनगर के दनकौर देहात में चार वर्षीय हिमांशु के साथ ऐसा ही बदलाव देखने को मिला है। उत्तर प्रदेश सरकार की ‘पोषण भी पढ़ाई भी’ योजना और बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग की पहल से अब हिमांशु अक्षरों और संख्याओं को पहचानने के साथ उन्हें कागज पर लिखने लगा है।

झिझक से आत्मविश्वास तक का सफर

दनकौर देहात निवासी विजय और राजेश के चार वर्षीय बेटे हिमांशु ने जब पहली बार आंगनवाड़ी केंद्र की चौखट पर कदम रखा, तब वह पढ़ाई से काफी झिझकता था। अक्षरों और संख्याओं को पहचानना और उन्हें कागज पर उतारना उसके लिए कठिन था। पढ़ाई की बात आते ही वह सहम जाता और केंद्र की गतिविधियों से दूर रहने की कोशिश करता था।

आंगनवाड़ी कार्यकत्री श्रीमती कल्पना ने हिमांशु की मनःस्थिति को समझते हुए उस पर पढ़ाई का दबाव नहीं बनाया। उन्होंने बच्चे को स्नेह और अपनत्व का माहौल दिया। साथ ही हिमांशु के माता-पिता से लगातार संवाद कर घर और आंगनवाड़ी केंद्र दोनों जगह उसके लिए सहज वातावरण तैयार किया।

खेल-खिलौनों से शुरू हुई सीखने की नई कहानी

आंगनवाड़ी केंद्र में हिमांशु को भारी-भरकम पुस्तकों के बजाय खेल-खिलौनों, रंग-बिरंगे चित्रों, बालगीतों, कविताओं और कहानियों के जरिए सीखने का अवसर दिया गया। शिक्षण-अधिगम सामग्री की मदद से उसे चित्रों के माध्यम से अक्षरों से जोड़ने की शुरुआत की गई।

शुरुआत में हिमांशु गतिविधियों को सिर्फ दूर खड़े होकर देखता था। धीरे-धीरे वह खेल-खेल में सीखने का हिस्सा बनने लगा। जब उसने पहली बार किसी अक्षर को सही पहचाना तो केंद्र में हुई तालियों ने उसके भीतर आत्मविश्वास जगाया। उसे महसूस हुआ कि वह भी सीख सकता है और सही जवाब दे सकता है।

अब खुद लिख रहा अक्षर और संख्याएं

लगातार स्नेह, अभ्यास और धैर्य का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। हिमांशु अक्षरों और संख्याओं की पहचान करने के साथ उन्हें अपनी नन्हीं उंगलियों से कागज पर लिखने लगा है। पढ़ाई और लिखने को लेकर उसका संकोच काफी हद तक दूर हो चुका है और सीखने के प्रति उसके भीतर नई उमंग दिखाई दे रही है।

आंगनवाड़ी केंद्र की गतिविधियों में उसकी हंसते-खिलखिलाते हुए भागीदारी और निडर होकर जवाब देने की आदत उसके बदलाव को बयां करती है। यह परिवर्तन सिर्फ हिमांशु के प्रयास का परिणाम नहीं है, बल्कि आंगनवाड़ी कार्यकत्री श्रीमती कल्पना के समर्पण और उसके माता-पिता विजय एवं राजेश के भरोसे का भी नतीजा है।

ममता और सही माहौल ने बदली सोच

आज हिमांशु आंगनवाड़ी केंद्र में सिर्फ खेलने नहीं आता, बल्कि सीखने और अपने भविष्य के सपने संजोने आता है। ‘पोषण भी पढ़ाई भी’ योजना के तहत मिले स्नेहपूर्ण और बाल-केंद्रित वातावरण ने उसके सीखने के डर को आत्मविश्वास में बदलने में मदद की है।

हिमांशु की यह कहानी उन बच्चों के लिए भी प्रेरणा है, जिन्हें सही अवसर, सहज वातावरण और थोड़ा सा स्नेह मिलने पर अपनी प्रतिभा को निखारने का मौका मिल सकता है। दनकौर देहात का यह उदाहरण बताता है कि बचपन में सीखने की मजबूत नींव रखने के लिए दबाव से ज्यादा जरूरी अपनापन और खेल के जरिए शिक्षा है।

 

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