यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सपा-कांग्रेस में सीटों पर घमासान! बातचीत से पहले कांग्रेस ने तैयार की अपनी रणनीति
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन और सीट बंटवारे पर इसी महीने बातचीत शुरू होने की उम्मीद है। दोनों दलों ने चुनाव एक साथ लड़ने का ऐलान कर रखा है, लेकिन सीटों को लेकर दोनों ओर से लगातार बयानबाजी जारी है। इसे कांग्रेस की ओर से दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। बातचीत शुरू होने से पहले कांग्रेस ने उन सीटों को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर ली है, जिन पर उसकी खास नजर है।
कांग्रेस गठबंधन में समाजवादी पार्टी से 150 से 200 सीटों तक की दावेदारी कर रही है। पार्टी ऐसी सीटें भी अपने हिस्से में चाहती है, जहां सपा वर्ष 2007 से अब तक बेहद कम अंतर से चुनाव हारती रही है। कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि अगर इन सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ती है तो सपा की हार के अंतर में रह गए वोटों को अपने पक्ष में लाकर जीत की संभावना बनाई जा सकती है। इससे गठबंधन के खाते में इन सीटों के आने की संभावना बढ़ेगी।
कम अंतर से हारी सीटों पर कांग्रेस की नजर
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ऐसी विधानसभा सीटों पर खास तौर पर नजर बनाए हुए है, जहां सपा मजबूत दावेदारी के बावजूद कुछ हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज नहीं कर सकी। वर्ष 2007 से अब तक उत्तर प्रदेश में कम से कम 100 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जिन्हें सपा कभी नहीं जीत सकी है। इनमें कई सीटें ऐसी हैं, जहां पार्टी मामूली अंतर से चुनाव हारती रही है।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का तर्क है कि जिन सीटों पर सपा जीत के लिए जरूरी वोटों से पीछे रह जाती थी, वहां कांग्रेस उस कमी को पूरा करने की कोशिश करेगी। पार्टी का मानना है कि इससे गठबंधन के लिए ज्यादा सीटें जीतने की संभावना बन सकती है।
कांग्रेस पिछले काफी समय से अपने संगठन और राजनीतिक कुनबे को मजबूत करने में जुटी है। पार्टी अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई पूर्व सांसदों और विधायकों को भी अपने साथ जोड़ने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक, इन नेताओं को चरणबद्ध तरीके से कांग्रेस में शामिल कराया जाएगा।
आरक्षित सीटों पर भी कांग्रेस की रणनीतिक नजर
कांग्रेस अपने हिस्से में आरक्षित विधानसभा सीटें लेने की रणनीति पर भी काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में कुल 86 आरक्षित सीटें हैं। इनमें 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और दो सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी अपने चुनाव चिह्न पर इनमें से 16 आरक्षित सीटें जीत सकी थी। वहीं भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने 65 आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार 77 आरक्षित सीटों पर विजयी हुए थे।
कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद दलितों के एक बड़े हिस्से का रुझान कांग्रेस की ओर बढ़ा है। ऐसे में पार्टी को इन आरक्षित सीटों पर अपनी जीत की संभावनाएं पहले के मुकाबले बेहतर नजर आ रही हैं।
सीट बंटवारे पर बातचीत से पहले बढ़ सकती है तल्खी
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत शुरू होने से लेकर अंतिम सहमति बनने तक खींचतान की स्थिति बनी रह सकती है। कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के तेवर भी फिलहाल तल्ख नजर आ रहे हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद भी सीटों की संख्या को लेकर लगातार बयान दे रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस नेताओं की इस तरह की बयानबाजी समाजवादी पार्टी को पसंद नहीं आ रही है। अखिलेश यादव का इंडिया गठबंधन की बैठक में खुद शामिल होने के बजाय सांसदों को प्रतिनिधि के तौर पर भेजना भी इसी नाराजगी का संकेत माना जा रहा है।
अगर दोनों दलों के नेतृत्व ने अपने नेताओं की बयानबाजी पर समय रहते लगाम नहीं लगाई तो दोनों के बीच मतभेद बढ़ सकते हैं। इसका सीधा नुकसान सपा-कांग्रेस गठबंधन को विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।