बिना बीमा वाले वाहनों से हादसा होने पर पीड़ितों को मुआवजा क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा तीखा सवाल, योजना के प्रचार का भी निर्देश

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नई दिल्ली: सड़क हादसों में जान गंवाने वालों के परिवारों और गंभीर रूप से घायल लोगों को तत्काल आर्थिक सहायता देने की केंद्र सरकार की प्रस्तावित योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने केंद्र से पूछा है कि अंतरिम मुआवजे का लाभ केवल बीमित वाहनों से जुड़े हादसों के पीड़ितों तक ही सीमित क्यों रखा गया है। बिना बीमा वाले वाहनों से दुर्घटना होने पर पीड़ितों को इस योजना से बाहर रखने की वजह भी पूछी गई है।

केंद्र सरकार की प्रस्तावित ‘कंपनसेशन टू विक्टिम्स (इंटरिम रिलीफ) स्कीम, 2026’ के तहत सड़क हादसे में मौत होने पर मृतक के परिवार को दो लाख रुपये और गंभीर चोट लगने पर पीड़ित को एक लाख रुपये की अंतरिम आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने योजना के दायरे और इसके क्रियान्वयन से जुड़े सवालों पर केंद्र का ध्यान खींचा है।

अब तक अधिसूचित नहीं हुई योजना, लोगों को जागरूक करने का निर्देश

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने गौर किया कि योजना को अब तक अधिसूचित नहीं किया गया है और न ही इसका पर्याप्त प्रचार-प्रसार हुआ है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि योजना के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए, ताकि सड़क हादसों के पीड़ित और उनके परिजन अंतरिम मुआवजे के लिए आवेदन करने के अपने अधिकार से परिचित हो सकें।

सड़क परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों ने अदालत को बताया कि मंत्रालय ने 23 फरवरी को ही योजना राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा कर दी थी। अधिकारियों के अनुसार, इसे केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के तहत अधिसूचित किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में मंत्रालय को सड़क हादसों के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए इस तरह की योजना तैयार करने का निर्देश दिया था।

बिना बीमा वाले वाहनों के पीड़ितों को एमएसीटी जाने की सलाह

सुनवाई के दौरान जब योजना में केवल बीमित वाहनों को शामिल करने पर सवाल उठा, तो केंद्र के अधिकारियों ने बताया कि इसे मोटर वाहन अधिनियम के उन प्रावधानों के तहत तैयार किया गया है, जो बीमित वाहनों से संबंधित हैं।

अधिकारियों के मुताबिक, यदि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार वाहन का बीमा नहीं है, तो पीड़ित को मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण यानी एमएसीटी का रुख करना होगा। इसी व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि बिना बीमा वाले वाहनों से हुए हादसों के पीड़ितों को अंतरिम राहत की योजना में शामिल क्यों नहीं किया गया।

मौत पर पांच लाख और गंभीर चोट पर 2.5 लाख रुपये के मुआवजे का प्रावधान

सुनवाई के दौरान पीठ ने योजना के क्लॉज 6 की भी पड़ताल की। इसके तहत सड़क हादसे का पीड़ित या मृतक का कानूनी वारिस निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकता है। आवेदन में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में दाखिल या लंबित दावों की जानकारी देना भी जरूरी होगा।

केंद्र के अधिकारियों ने बताया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164 के तहत मौत या गंभीर चोट के मामलों में बिना गलती साबित किए मुआवजा देने का प्रावधान है। इसके अनुसार, वाहन मालिक या बीमा कंपनी को मौत होने पर पांच लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में 2.5 लाख रुपये का भुगतान करना होता है।

इस प्रावधान के तहत मुआवजे का दावा करने वाले व्यक्ति को यह साबित करने की जरूरत नहीं होती कि मौत या चोट वाहन मालिक की गलती, लापरवाही अथवा चूक के कारण हुई थी।

अंतरिम सहायता और अंतिम मुआवजे में क्या है अंतर?

केंद्र के अधिकारियों के अनुसार, हादसे के पीड़ितों को तत्काल आर्थिक मदद देने के उद्देश्य से प्रस्तावित योजना में मौत के मामले में दो लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में एक लाख रुपये की अंतरिम सहायता निर्धारित की गई है।

हालांकि, यह अंतरिम राहत है। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के आदेश के आधार पर अंतिम मुआवजे की राशि इससे अधिक हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के सवालों के बाद अब योजना के दायरे, अधिसूचना और उसके प्रचार-प्रसार से जुड़े मुद्दे अहम हो गए हैं।

 

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