दरअसल, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के नियमों के मुताबिक, शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के कम से कम 25 प्रतिशत शेयर आम निवेशकों के पास होने चाहिए। इसी शर्त को पूरा करने के लिए सरकार इन चार बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम करने की योजना बना रही है।
द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अगले एक साल में इन बैंकों में सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने की कोशिश की जा सकती है। इसके लिए बैंक खुद बाजार से पूंजी जुटा सकते हैं। वहीं, सरकार बाजार की स्थिति को देखते हुए ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए भी अपने कुछ शेयर बेच सकती है।
बैंकों ने वित्त मंत्रालय से इस प्रक्रिया के लिए एक साल का अतिरिक्त समय मांगा है। उनका कहना है कि मौजूदा बाजार परिस्थितियों में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) के जरिए 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी बेचना आसान नहीं है।
किस बैंक में सरकार की कितनी हिस्सेदारी है?
चारों बैंकों में फिलहाल सरकार की हिस्सेदारी काफी अधिक है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इंडियन ओवरसीज बैंक में केंद्र सरकार के पास करीब 92.44 प्रतिशत शेयर हैं। यूको बैंक में यह हिस्सेदारी 90.95 प्रतिशत, पंजाब एंड सिंध बैंक में 93.85 प्रतिशत और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 81.19 प्रतिशत है।
प्रस्तावित योजना के तहत इन बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी घटाकर 75 प्रतिशत तक लाई जा सकती है। हालांकि, शेयरों की बिक्री कब और किस तरीके से होगी, इस पर अभी अंतिम फैसला होना बाकी है।
क्या सरकारी बैंकों का निजीकरण भी होगा?
सरकार की हिस्सेदारी कम करने की योजना को सीधे बैंकों के निजीकरण से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। सरकारी हिस्सेदारी में कमी का अर्थ यह नहीं है कि बैंकों का नियंत्रण निजी कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य शेयर बाजार में आम निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ाने से जुड़ी नियामकीय शर्त को पूरा करना है।
हालांकि, सरकारी बैंकों के निजीकरण पर पहले भी चर्चा होती रही है। नीति आयोग ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक के नाम संभावित निजीकरण विकल्पों के रूप में सुझाए थे। लेकिन इन बैंकों के निजीकरण को लेकर किसी अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं है।
शेयर बेचने से क्या होगा फायदा?
सरकार की हिस्सेदारी घटने से बाजार में इन बैंकों के अधिक शेयर उपलब्ध हो सकते हैं। इससे आम निवेशकों को सरकारी बैंकों में निवेश के अधिक अवसर मिलेंगे और शेयरों का सार्वजनिक कारोबार बढ़ सकता है। वहीं, सरकार को अपनी हिस्सेदारी बेचने से राजस्व भी प्राप्त होगा।
हालांकि, शेयरों की बिक्री का वास्तविक असर बाजार की स्थिति, निवेशकों की मांग और सरकार की ओर से अपनाए जाने वाले तरीके पर निर्भर करेगा।