पेट्रोल-डीजल के रेट पर राहत कब तक? कच्चा तेल 108 डॉलर के पार, बढ़ रहा कंपनियों पर दबाव

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नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमतों में मामूली गिरावट के बावजूद ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल के पार बना हुआ है। वहीं डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत करीब 105 डॉलर प्रति बैरल थी। इसके बावजूद 16 सितंबर को भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत बरकरार है। दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के ऊपर रहने के बीच घरेलू ईंधन की कीमतों पर यह राहत आखिर कब तक बनी रहेगी।

ऑयल कंपनियों पर बढ़ रहा दबाव

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने का सीधा असर तेल कंपनियों की लागत पर पड़ता है। मौजूदा समय में कच्चे तेल की कीमत लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है, जिससे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है।

एक बैरल कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर की बढ़ोतरी होने पर कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होने का अनुमान है। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो कंपनियों के लिए मौजूदा कीमतों पर पेट्रोल-डीजल बेचना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

पहले भी कीमतों को लेकर लिया गया था बड़ा फैसला

ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के शुरुआती दौर में जब कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई थी, तब दुनिया के कई देशों में महंगाई का दबाव बढ़ा था। उस समय पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और भूटान समेत कई देशों में महंगे तेल का असर आम लोगों पर पड़ा था।

भारत में उस दौरान पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे थे और करीब 76 दिनों तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं हुई। सरकार ने कीमतों के दबाव को कम करने के लिए एक्साइज ड्यूटी में भी 10-10 रुपये की कटौती की थी। चुनाव खत्म होने के बाद मई में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी हुई और कुल 7.50-7.50 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की गई।

इस साल ब्रेंट क्रूड करीब 80 फीसदी चढ़ा

2026 कच्चे तेल के बाजार के लिए काफी उतार-चढ़ाव वाला साल रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत इस साल अब तक करीब 80 फीसदी बढ़ चुकी है। हालांकि अप्रैल में बने 126 डॉलर प्रति बैरल से थोड़ा नीचे मौजूदा कीमतें हैं, लेकिन बाजार में आगे भी तेजी की आशंका बनी हुई है।

अगर मध्य पूर्व में तेल की आपूर्ति बाधित होती है और चीन की तेल मांग बढ़ती है, तो कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर ऊंचे स्तरों की ओर बढ़ सकती हैं।

100 डॉलर से ऊपर का कच्चा तेल क्यों बढ़ाता है चिंता?

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक क्रूड महंगा रहने पर घरेलू ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि ब्रेंट क्रूड के 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का मतलब यह नहीं है कि भारत में अगले ही दिन पेट्रोल-डीजल महंगा हो जाएगा।

घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमत तय करने में कच्चे तेल के अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत, रिफाइनिंग लागत, टैक्स, मार्जिन और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति जैसे कई कारकों की भूमिका होती है।

महंगे तेल का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक नहीं

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। डीजल महंगा होने पर ट्रकों और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। इसका असर सब्जियों, अनाज, दूध और रोजमर्रा की दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है, तो महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है।

 

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