आंखों में आंसू, चेहरे पर मुस्कान… मां दुर्गा की विदाई से पहले क्यों निभाई जाती है ‘देवी बरण’ की रस्म?
नई दिल्ली: शारदीय नवरात्र के समापन और विजयदशमी के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई का पल भक्तों के लिए बेहद भावुक होता है। खासकर पश्चिम बंगाल में मां को विदा करने से पहले ‘देवी बरण’ की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इस रस्म में सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर, पान और मिठाई अर्पित कर उनका आशीर्वाद लेती हैं। मान्यता है कि मां दुर्गा इन दिनों अपने मायके आई बेटी की तरह भक्तों के बीच रहती हैं और विसर्जन के समय उन्हें उसी भाव से विदा किया जाता है, जैसे घर से बेटी की विदाई होती है।
क्या है देवी बरण की परंपरा?
बंगाल की दुर्गा पूजा में देवी बरण को महत्वपूर्ण पारंपरिक अनुष्ठान माना जाता है। विजयदशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से पहले यह रस्म निभाई जाती है। इसके जरिए भक्त मां के प्रति प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
इस परंपरा में सुहागिन महिलाएं पूरे आदर और भावुकता के साथ मां दुर्गा को विदाई देती हैं। वे देवी को सिंदूर, पान, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करती हैं। इसके बाद मां के माथे और चरणों में सिंदूर लगाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। रस्म के दौरान महिलाएं एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाती हैं।
कैसे निभाई जाती है देवी बरण की रस्म?
देवी बरण की विधि अलग-अलग स्थानों पर कुछ भिन्न हो सकती है। आमतौर पर महिलाएं थाली में पान, सुपारी, मिठाई, सिंदूर और अन्य पारंपरिक पूजन सामग्री सजाकर मां दुर्गा के सामने पहुंचती हैं। वे देवी को भोग अर्पित करती हैं, आरती करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
इसके बाद मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाया जाता है। इस दौरान ढाक की गूंज, शंखनाद और जयकारों से पूजा स्थल का माहौल भक्तिमय हो जाता है। परंपरा के कुछ रूपों में पान के पत्ते से मां की आंखों के आंसू पोंछने की रस्म भी निभाई जाती है। इसके पीछे भाव यह है कि मां की विदाई सुखद हो और वे उदास मन से अपने ससुराल न लौटें।
देवी बरण की रस्म पूरी होने के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा का विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है।
बेटी की विदाई से क्यों जुड़ी है यह परंपरा?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा यानी माता पार्वती अपने मायके आती हैं। कुछ दिनों तक भक्तों के बीच रहने के बाद विजयदशमी पर वे कैलाश पर्वत स्थित अपने ससुराल लौटती हैं। इसी मान्यता के चलते उनकी विदाई को बेटी की विदाई के समान माना जाता है।
जिस तरह बेटी को विदा करते समय परिवार के लोग भावुक हो जाते हैं, उसी तरह मां दुर्गा की विदाई के समय भी भक्तों की आंखें नम हो जाती हैं। चेहरे पर मुस्कान के साथ महिलाएं मां को विदा करती हैं और अगले वर्ष फिर उनके आगमन की कामना करती हैं।
सुहाग और परिवार की खुशहाली की कामना
देवी बरण को मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ सौभाग्य और पारिवारिक सुख-शांति की कामना से भी जोड़ा जाता है। सुहागिन महिलाएं इस अवसर पर अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
इस तरह देवी बरण केवल विदाई की रस्म नहीं, बल्कि मां दुर्गा के प्रति प्रेम, अपनत्व और आस्था को व्यक्त करने वाली परंपरा है। इसमें बेटी के मायके आने की खुशी और उसके लौटने का भावुक क्षण एक साथ दिखाई देता है।