‘वो मुझे रुपयों के लिए परेशान कर रहा है…’ सुरेंद्र कोली के आखिरी शब्द बने रहस्य, अगली सुबह आत्महत्या से खत्म हुई जिंदगी
हरिद्वार: निठारी कांड में सुप्रीम कोर्ट से दोषमुक्त हो चुके सुरेंद्र कोली की आत्महत्या ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, आत्महत्या से एक रात पहले उन्होंने फोन पर बताया था कि उन्हें खोखे के किराए के पैसों को लेकर परेशान किया जा रहा है। अगले ही दिन उन्होंने आत्महत्या कर ली।
आखिरी फोन कॉल में बयां किया था अपना दर्द
रानीखेत निवासी पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने बताया कि आत्महत्या से एक रात पहले सुरेंद्र कोली का फोन आया था। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि खोखा उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति ने किराया बढ़ा दिया है और लगातार रुपयों के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने इस मामले में मदद की भी अपील की थी। इसके अगले ही दिन उनकी आत्महत्या की खबर सामने आई।
19 साल की कानूनी लड़ाई के बाद भी नहीं संभल सकी जिंदगी
सुप्रीम कोर्ट से बीते वर्ष दोषमुक्त होने के बाद सुरेंद्र कोली कुछ समय तक दिल्ली में रहे और रोजगार की तलाश की। बाद में वह हरिद्वार पहुंचे और चाय का खोखा लगाकर आजीविका चलाने लगे। इससे पहले वह अपने पैतृक गांव भी पहुंचे थे, जहां विशेष पूजन में शामिल हुए। उनका मंगरूखाल स्थित पैतृक मकान पूरी तरह जर्जर हो चुका है।
गांव में आत्महत्या की खबर से लोग रह गए स्तब्ध
सुरेंद्र कोली की आत्महत्या की जानकारी मिलते ही गांव में शोक और हैरानी का माहौल बन गया। पूर्व ग्राम प्रधान जोगा सिंह ने कहा कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि सुरेंद्र इस तरह अपनी जिंदगी खत्म कर देंगे। गांव के लोगों के मुताबिक, लंबे समय बाद उनके गांव आने से लोगों ने उनसे मुलाकात भी की थी।
आर्थिक तंगी में मिली थी मदद
पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने बताया कि उन्होंने समय-समय पर सुरेंद्र को आर्थिक सहायता भी दी थी। उनके अनुसार, हरिद्वार में खोखा लगाकर वह किसी तरह अपना जीवन चला रहे थे और किराए को लेकर बढ़ते दबाव की बात उन्होंने आखिरी बातचीत में भी कही थी।
निठारी कांड के बाद पूरी तरह बदल गई पारिवारिक जिंदगी
साल 2006 के निठारी कांड के बाद सुरेंद्र कोली का जीवन पूरी तरह बदल गया। गिरफ्तारी के समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं। बेटे के जन्म के बाद वह जेल में उनसे मिलने जाती थीं। बाद में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई तो परिवार पर इसका गहरा असर पड़ा। वर्ष 2015 में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था।
पत्नी और मां भी साथ छोड़ गईं
करीब वर्ष 2019 के आसपास सामाजिक तिरस्कार के डर से उनकी पत्नी अपने करीब 13 वर्षीय बेटे को लेकर गांव छोड़कर चली गईं। इसके बाद उनकी मां गांव में अकेली रह गईं। कुछ महीनों बाद उनका भी निधन हो गया। परिवार के अन्य सदस्यों का साथ भी धीरे-धीरे छूट गया।
तीनों भाइयों ने भी गांव से बना ली थी दूरी
गांव के लोगों के अनुसार, निठारी कांड में गिरफ्तारी के बाद सुरेंद्र कोली के तीनों भाइयों ने भी गांव से नाता तोड़ लिया था। बड़ा भाई चंदन और छोटा भाई मंगत दिल्ली में रहने लगे, जबकि सबसे छोटे भाई आनंद निजी स्कूल में शिक्षक हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सुरेंद्र कुशल कारीगर थे और अपने हुनर के लिए जाने जाते थे।