हापुड़ में रातभर लगता है दशहरा मेला, तड़के जलता है रावण का पुतला; 1941 से कायम है अनोखी परंपरा

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हापुड़: देशभर में दशहरे की शाम या रात को रावण दहन किया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के हापुड़ में यह परंपरा सबसे अलग है। यहां रातभर दशहरा मेला चलता है और सुबह तड़के दशानन का पुतला जलाया जाता है। वर्ष 1941 में शुरू हुई यह परंपरा करीब 85 साल बाद भी कायम है। कभी ग्रामीण परिवारों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर अपनाई गई इस व्यवस्था को अब हापुड़ की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है।

सुरक्षा की चिंता से शुरू हुई थी परंपरा

करीब 85 साल पहले आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग दशहरा मेला देखने हापुड़ पहुंचते थे। 10 से 15 किलोमीटर दूर स्थित गांवों के परिवार बैलगाड़ियों से मेले में आते थे और दिनभर इसकी रौनक का आनंद लेते थे। उस दौर में शाम को रावण दहन के बाद अंधेरे में गांव लौटना उनके लिए जोखिम भरा होता था। सुनसान रास्तों पर लूटपाट की आशंका के कारण परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती थी।

बुजुर्गों ने निकाला रास्ता, रातभर चलने लगा मेला

ग्रामीणों की सुरक्षा की समस्या को देखते हुए वर्ष 1941 में बुजुर्गों ने मेला रातभर जारी रखने और सुबह तड़के रावण दहन करने का फैसला लिया। इसका उद्देश्य यह था कि लोग रात के अंधेरे के बजाय सुबह उजाला होने पर अपने गांवों के लिए रवाना हो सकें। धीरे-धीरे यह व्यवस्था परंपरा में बदल गई। तब से हापुड़ में दशहरा मेले की रौनक रातभर बनी रहती है और रावण दहन सुबह किया जाता है।

बैलगाड़ियों की जगह कारें आईं, लेकिन नहीं बदला समय

वक्त के साथ परिवहन के साधनों में बड़ा बदलाव आया है। अब ग्रामीण बैलगाड़ियों के बजाय मोटरसाइकिलों, कारों और दूसरे वाहनों से मेले में पहुंचते हैं। आवागमन के साधन बदल गए और पहले जैसी परिस्थितियां भी काफी हद तक बदल चुकी हैं, लेकिन रावण दहन का समय आज भी वही है। करीब 85 साल से चली आ रही यह परंपरा हर साल उसी तरह निभाई जा रही है।

अनिष्ट की आशंका के चलते बदलाव से बच रहे आयोजक

इस परंपरा के साथ अब धार्मिक मान्यताएं और अनिष्ट की आशंकाएं भी जुड़ गई हैं। ऐसे में रावण दहन का समय बदलने को लेकर आयोजक सहज नहीं हैं। उनका कहना है कि पहले भी समय बदलने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बाद कुछ अनिष्ट होने की बात सामने आई। इसी वजह से परंपरा को पहले की तरह जारी रखने का निर्णय लिया गया।

रामलीला कार्यकारिणी के पदाधिकारी सुयश वशिष्ठ के मुताबिक, पूर्वजों ने उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए सुबह रावण दहन की व्यवस्था शुरू की थी। पिछले वर्षों में समय बदलने का प्रयास हुआ, लेकिन कथित तौर पर अनिष्ट की घटनाओं के बाद पुरानी व्यवस्था को ही बनाए रखने का फैसला किया गया। फिलहाल इस परंपरा में बदलाव की संभावना नहीं है।

 

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