हाइड्रोजन या LNG ट्रेन, कौन कितनी अलग? एक से शून्य टेलपाइप उत्सर्जन, दूसरी से हर साल ₹25 लाख की बचत; जानिए दोनों की तकनीक

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नई दिल्ली: भारतीय रेलवे वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल की दिशा में हाइड्रोजन और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) से चलने वाली ट्रेनों पर काम कर रहा है। दोनों का मकसद रेल परिचालन में डीजल पर निर्भरता और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करना है, लेकिन इनकी तकनीक और उपयोग अलग-अलग हैं। हाइड्रोजन ट्रेन ईंधन सेल के जरिए बिजली बनाकर चलती है, जबकि LNG ट्रेन में डीजल के साथ प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल किया जाता है। एक ओर हाइड्रोजन ट्रेन से सीधे निकास के स्तर पर कार्बन उत्सर्जन नहीं होता, वहीं LNG तकनीक से ईंधन की खपत और परिचालन लागत घटाने में मदद मिल सकती है।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे चलती है?

हाइड्रोजन ट्रेन में उच्च दबाव वाले सिलेंडरों में रखी हाइड्रोजन गैस का इस्तेमाल किया जाता है। इसे प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) फ्यूल सेल में पहुंचाया जाता है, जहां ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है। यही बिजली ट्रेन की प्रणोदन प्रणाली को चलाती है। इस प्रक्रिया में सीधे तौर पर पानी की भाप और गर्मी निकलती है।

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 जुलाई को शुरू किया था। इसमें दो हाइड्रोजन चालित पावर कार और आठ यात्री डिब्बे हैं। दोनों पावर कारों की संयुक्त क्षमता 2,400 किलोवाट बताई गई है। ट्रेन की डिजाइन गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि जींद-सोनीपत मार्ग पर इसकी परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा बताई गई है।

इस ट्रेन में कुल 10 डिब्बे हैं और इसमें करीब 2,600 यात्रियों के सफर करने की क्षमता बताई गई है। हाइड्रोजन रिसाव, गर्मी और धुएं का पता लगाने वाले सेंसर, आपातकालीन शट-ऑफ वाल्व और वेंटिलेशन जैसी सुरक्षा व्यवस्थाएं भी इसमें शामिल हैं।

LNG ट्रेन की तकनीक हाइड्रोजन से कैसे अलग है?

LNG का पूरा नाम लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस है। यह हाइड्रोकार्बन आधारित ईंधन है। हाइड्रोजन ट्रेन के विपरीत, LNG ट्रेन में ईंधन सेल से बिजली पैदा नहीं की जाती, बल्कि आंतरिक दहन इंजन के जरिए ट्रेन चलाई जाती है।

भारतीय रेलवे की LNG परियोजना में मौजूदा डीजल पावर कारों को दोहरे ईंधन वाली प्रणाली में बदला गया है। गुजरात के साबरमती से जुड़ी इस परियोजना में 1,400 हॉर्सपावर की दो ड्राइविंग पावर कारों का इस्तेमाल किया गया है। इस व्यवस्था में LNG, डीजल की खपत के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से की जगह ले सकती है।

27 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साबरमती से देश की पहली LNG से संचालित यात्री ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य डीजल की खपत कम करना, ईंधन खर्च घटाना और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद करना है।

हर साल ₹25 लाख की बचत कैसे होगी?

LNG आधारित दोहरे ईंधन वाली प्रणाली में डीजल की जगह प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करने से परिचालन लागत कम हो सकती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रत्येक ड्राइविंग पावर कार पर सालाना करीब 25 लाख रुपये की बचत का अनुमान है।

इस ट्रेन की प्रत्येक ड्राइविंग पावर कार में 2,200 लीटर क्षमता वाला LNG टैंक दिया गया है। दावा है कि एक बार ईंधन भरने के बाद ट्रेन 1,600 से 2,200 किलोमीटर तक चल सकती है। ईंधन की उपलब्धता के अनुसार यह प्रणाली LNG और डीजल के बीच बदलाव भी कर सकती है।

प्रदूषण के मामले में दोनों में क्या अंतर है?

हाइड्रोजन ट्रेन की खासियत यह है कि फ्यूल सेल से बिजली बनाने की प्रक्रिया में उसके निकास से कार्बन डाइऑक्साइड या धुएं का सीधा उत्सर्जन नहीं होता। हालांकि, इसके वास्तविक पर्यावरणीय लाभ इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि हाइड्रोजन का उत्पादन किस तरीके से और किस ऊर्जा स्रोत से किया गया है।

दूसरी ओर, LNG ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कणीय प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम कर सकती है। लेकिन इसमें ईंधन जलाया जाता है, इसलिए इसे पूरी तरह शून्य उत्सर्जन वाली ट्रेन नहीं कहा जा सकता। प्राकृतिक गैस के उत्पादन और परिवहन के दौरान मीथेन का रिसाव भी उसके कुल पर्यावरणीय प्रभाव को प्रभावित कर सकता है।

भारतीय रेलवे के लिए दोनों तकनीकों का क्या महत्व है?

हाइड्रोजन और LNG ट्रेनें वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल के दो अलग-अलग रास्ते दिखाती हैं। हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल सेल के जरिए बिजली पैदा करके ट्रेन चलाई जाती है, जबकि LNG तकनीक मौजूदा डीजल आधारित व्यवस्था में बदलाव करके ईंधन की खपत घटाने पर केंद्रित है।

हाइड्रोजन ट्रेन की प्रमुख विशेषता सीधे निकास पर शून्य उत्सर्जन है, जबकि LNG ट्रेन का मुख्य लाभ डीजल की खपत और परिचालन लागत कम करने की संभावना है। दोनों तकनीकों का वास्तविक फायदा उनके परिचालन खर्च, ईंधन की उपलब्धता, रखरखाव और पूरे जीवनचक्र में होने वाले उत्सर्जन पर निर्भर करेगा।

 

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