2,700 रुपये की दवा 27 हजार में क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा- 10 गुना कीमत का फायदा किसे, 16% मार्जिन पर दिया जोर
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों में कैंसर की दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि जिस दवा की खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति 2,700 रुपये में होती है, वही दवा मरीजों को 27,000 रुपये की अधिकतम खुदरा कीमत पर मिल रही है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर को लेकर सवाल उठाते हुए इसे ‘लूट’ बताया और सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन रखने की संभावना पर विचार करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 के तहत दवाओं की कीमतों के नियमन, डॉक्टरों द्वारा जेनेरिक दवाएं लिखे जाने और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले में समाधान निकालने और सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।
दवा की कीमत में 10 गुना अंतर पर कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने सवाल किया कि जब किसी कैंसर की जरूरी दवा की खुदरा विक्रेता को आपूर्ति कीमत 2,700 रुपये है, तो उसकी एमआरपी 27,000 रुपये क्यों रखी गई है। अदालत ने पूछा कि इतनी बड़ी रकम का अंतर आखिर कहां जा रहा है और इससे किसे फायदा हो रहा है।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन रखने के विकल्प पर विचार करने की बात कही। पीठ ने कहा कि इस तरह की कीमतों का अंतिम नुकसान आम आदमी और ईमानदार करदाताओं को उठाना पड़ता है।
अस्पताल की तय फार्मेसी से दवा खरीदने पर भी सवाल
पीठ ने केंद्र सरकार से इस बात पर भी गौर करने को कहा कि कई निजी अस्पताल मरीजों को अपनी ही दवाखाना या किसी खास फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। अदालत के मुताबिक, कुछ मामलों में मरीज के बाहर से दवा खरीदने पर अस्पताल उपचार की गारंटी नहीं देने की बात कहते हैं।
न्यायमूर्ति मेहता ने सवाल किया कि अगर कोई मरीज सरकारी योजना के तहत इलाज कराता है और उसका खर्च करदाता उठाता है, तो ऐसे मामलों में नियम एक जैसे क्यों नहीं होने चाहिए।
डीपीसीओ और 16 प्रतिशत मार्जिन का मुद्दा
पीठ ने कहा कि डीपीसीओ के तहत 16 प्रतिशत मार्जिन का प्रावधान है और दवाएं आवश्यक वस्तुओं के दायरे में आती हैं। अदालत ने सवाल किया कि इसके बावजूद दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर कैसे पैदा हो रहा है।
न्यायमूर्ति मेहता ने यह भी कहा कि यदि कोई फार्मासिस्ट जरूरतमंद मरीज को वही दवा 2,700 रुपये में देने की बात कहे, तो मरीज के मन में दवा के असली या नकली होने का संदेह पैदा हो सकता है। अदालत ने पूछा कि 10 गुना अधिक कीमत वसूलने के पीछे वजह क्या है और इस अंतर का लाभ किसे मिल रहा है।
फार्मा कंपनियों को नहीं, निजी अस्पतालों को फायदा?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उनके अनुसार इस अतिरिक्त कीमत का लाभ फार्मा कंपनियों को नहीं मिल रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि इसका फायदा निजी अस्पतालों को हो रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि इस मामले में सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए कोई संतुलित व्यवस्था तलाशनी होगी।
सुनवाई के दौरान पीठ ने सामान्य स्टेटिन की कीमत का भी उदाहरण दिया। अदालत ने कहा कि बिना किसी संयोजन वाली सामान्य स्टेटिन की कीमत 40 रुपये है, जबकि एस्पिरिन के साथ संयोजन होने पर इसकी कीमत 70 रुपये हो जाती है। इस पर भी पीठ ने सवाल उठाया कि कीमत में यह अंतर कैसे तय होता है।
केंद्र से जवाब मांगा, 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की विस्तार से पड़ताल की जाएगी क्योंकि इसका असर समाज के एक बड़े हिस्से पर पड़ता है। अदालत ने दवाओं की कीमत के साथ-साथ चिकित्सकों के नैतिक तौर-तरीकों से जुड़े पहलू को भी अलग मुद्दा बताया।
सॉलिसिटर जनरल ने केंद्र के संबंधित अधिकारियों से चर्चा के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तारीख तय की है और कहा है कि वह इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का जवाब सुनेगी।