11 जून को मनाई जाएगी परमा एकादशी, मलमास में विष्णु पूजा से मिलते हैं विशेष फल, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
लखनऊ: परमा एकादशी 2026 इस वर्ष 11 जून को मनाई जाएगी। यह व्रत अधिकमास यानी पुरुषोत्तम माह में पड़ने वाली एक विशेष एकादशी मानी जाती है, जो हर तीन वर्ष में आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने से सभी पापों का नाश होता है, दरिद्रता दूर होती है और साधक को वैकुंठ धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। साथ ही यह व्रत जीवन में सुख-समृद्धि और दुर्लभ सिद्धियों का भी वरदान देने वाला माना गया है।
अधिकमास का विशेष महत्व और परमा एकादशी का स्थान
अधिकमास को भगवान विष्णु का मास कहा जाता है, जिसे पुरुषोत्तम माह भी कहा जाता है क्योंकि भगवान विष्णु ने इस माह को अपना नाम पुरुषोत्तम प्रदान किया था। इसे मलमास भी कहा जाता है। इस माह में सामान्य रूप से 24 के स्थान पर 26 एकादशी व्रत आते हैं। इनमें पद्मिनी और परमा एकादशी विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार परमा एकादशी दुर्लभ सिद्धियों को प्रदान करने वाली एकादशी है, जो श्रद्धालुओं के जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों स्तरों पर सकारात्मक परिणाम देती है।
परमा एकादशी का धार्मिक महत्व
परमा एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत और भगवान विष्णु की आराधना करने से सभी प्रकार के पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह व्रत मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी खोलता है। मान्यता यह भी है कि श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस दिन को अत्यंत शुभ माना गया है, क्योंकि यह आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने वाला और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना जाता है।
परमा एकादशी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 10 जून, बुधवार को देर रात 12 बजकर 58 मिनट से प्रारंभ होगी और इसका समापन 11 जून, गुरुवार को रात 10 बजकर 37 मिनट पर होगा। ऐसे में परमा एकादशी का व्रत 11 जून 2026 को रखा जाएगा। व्रत का पारण 12 जून को किया जाएगा, जिसका शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 23 मिनट से 08 बजकर 10 मिनट तक निर्धारित है।
परमा एकादशी की पूजा विधि
इस दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लेते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। पूजा में पीले फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। तुलसी का विशेष महत्व होता है और इसे पूजा में अवश्य शामिल किया जाता है। इसके साथ ही व्रत कथा का पाठ, विष्णु मंत्रों का जाप और अंत में आरती के साथ पूजा का समापन किया जाता है।