हिमाचल में पेट्रोल-डीजल पर 60 पैसे का नया बोझ! क्या है ‘विधवा-अनाथ सेस’, क्यों सुक्खू सरकार ने लगाया ये टैक्स?

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शिमला: हिमाचल प्रदेश में वाहन चालकों को महंगाई का एक और झटका लगा है। सोमवार, 12 अगस्त से राज्य में पेट्रोल और डीजल की कीमत 60 पैसे प्रति लीटर बढ़ गई है। इसकी वजह कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि राज्य सरकार की ओर से लगाया गया नया टैक्स है। इसे ‘विधवा और अनाथ सेस’ यानी ‘विडो एंड ऑर्फन सेस’ नाम दिया गया है।

क्या है ‘विधवा और अनाथ सेस’?

हिमाचल प्रदेश के कर एवं आबकारी विभाग ने राज्य के वैट कानून के तहत इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। नया सेस तेल कंपनियों की ओर से डीलरों को की जाने वाली ईंधन की पहली बिक्री पर लागू होगा। फिलहाल इसकी दर 60 पैसे प्रति लीटर रखी गई है।

हालांकि, कानून के तहत सरकार के पास इस सेस को बढ़ाकर 5 रुपये प्रति लीटर तक करने का अधिकार है। यानी आने वाले समय में इसकी दर बढ़ाई भी जा सकती है।

विधवाओं और अनाथों के लिए स्थायी फंड बनाने की योजना

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मार्च 2026 में विधानसभा में इस सेस से संबंधित विधेयक पेश किया था। सरकार का उद्देश्य विधवाओं और अनाथों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाओं के लिए एक स्थायी फंड तैयार करना है, ताकि इन योजनाओं के लिए हर बार सीधे बजट पर निर्भरता कम हो।

सरकार ने इसी उद्देश्य से पेट्रोल और डीजल पर नया उपकर लगाने का फैसला किया है।

पेट्रोल पंप डीलरों ने उठाए सवाल, विपक्ष भी हमलावर

सरकार के फैसले पर पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने सवाल उठाए हैं। एसोसिएशन ने इसे अनुचित बताते हुए आशंका जताई है कि ईंधन महंगा होने के बाद लोग पड़ोसी राज्यों से पेट्रोल और डीजल खरीदना शुरू कर सकते हैं। इससे राज्य को अतिरिक्त राजस्व मिलने के बजाय नुकसान होने की संभावना है।

डीलरों ने सरकार से यह भी पूछा है कि राज्य में कितनी विधवाएं और अनाथ हैं तथा सेस से जुटाए जाने वाले पैसे को किस योजना के तहत और किस तरीके से खर्च किया जाएगा। एसोसिएशन का कहना है कि सरकार की ओर से इस संबंध में अभी स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है।

अनुराग ठाकुर ने बताया टैक्स का गणित

बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने भी सेस को लेकर हिमाचल सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि राज्य में डीजल पर पहले ही दो बार 3-3 रुपये का वैट बढ़ाया जा चुका है। नए सेस और वैट को मिलाकर डीजल पर कुल अतिरिक्त कर 15.40 रुपये तक पहुंच गया है।

ठाकुर के अनुमान के मुताबिक सरकार इन करों के जरिए हर साल 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका सीधा असर आम लोगों, व्यापारियों, किसानों और ड्राइवरों की जेब पर पड़ेगा।

इस फैसले को लेकर एक सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि जिन विधवाओं और अनाथ बच्चों के कल्याण के लिए सेस लगाया गया है, उसी ईंधन का इस्तेमाल करने वाले परिवारों, टैक्सी चालकों और किसानों पर भी इसका आर्थिक बोझ पड़ेगा।

आखिर आर्थिक संकट के बीच क्यों लिया गया फैसला?

हिमाचल प्रदेश इस समय गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है। राज्य पर कुल कर्ज 1,04,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है।

वित्त वर्ष 2026-27 में राज्य को 13,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं, जबकि सरकार की योजना 10,000 करोड़ रुपये का कर्ज लेने की है। इस हिसाब से करीब 3,000 करोड़ रुपये का सीधा अंतर बन रहा है।

इसके अलावा 16वें वित्त आयोग ने 2026 से 2031 तक राजस्व घाटा अनुदान को पूरी तरह बंद करने की सिफारिश की है। इससे राज्य को पांच साल की अवधि में 35,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है।

इससे पहले राज्य में सरकारी कर्मचारियों को वेतन मिलने में देरी भी हो चुकी है। इसके अलावा ‘टॉयलेट टैक्स’ और अधिकारियों के वेतन में 30 फीसदी कटौती जैसे प्रस्तावों को लेकर भी चर्चा हो चुकी है।

दूसरे राज्यों में भी ईंधन पर लगाया जाता है सेस

ईंधन पर सेस लगाकर कल्याणकारी या विकास योजनाओं के लिए धन जुटाना केवल हिमाचल तक सीमित नहीं है। कई अन्य राज्यों में भी अलग-अलग उद्देश्यों के लिए पेट्रोल और डीजल पर अतिरिक्त उपकर लगाया जाता है।

केरल में सामाजिक सुरक्षा के लिए अप्रैल 2023 से 2 रुपये प्रति लीटर सेस लगाया जाता है। आंध्र प्रदेश और झारखंड में सड़क विकास और बुनियादी ढांचे के लिए 1 रुपये प्रति लीटर सेस लगाया जाता है। जम्मू-कश्मीर में रोजगार योजनाओं के लिए 1.50 रुपये प्रति लीटर का सेस है।

इसके अलावा गोवा में 0.5 फीसदी, मध्य प्रदेश में 1 फीसदी, नगालैंड में 2 रुपये और त्रिपुरा में 3 फीसदी तक ऐसे कर पर्यावरण, सड़क या कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर लगाए जाते हैं।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार हिमाचल प्रदेश ऐसा पहला राज्य है जिसने विशेष रूप से विधवाओं और अनाथों के कल्याण के नाम पर पेट्रोल-डीजल पर सेस लगाया है।

 

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