5 सीटें जीतते ही विधान परिषद में सपा को मिल सकता है नेता प्रतिपक्ष का पद, अखिलेश की बढ़ी ताकत से BJP की बढ़ेगी चिंता?
इन चुनावों को विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा था। सपा ने वाराणसी की अपनी दोनों सीटें बरकरार रखीं और लखनऊ की स्नातक सीट भाजपा से छीन ली। इसके अलावा आगरा शिक्षक सीट पर भी जीत दर्ज की, जो पहले निर्दलीय उम्मीदवार के पास थी। दूसरी ओर भाजपा ने अपनी सीटों की संख्या बरकरार रखी है।
वर्ष 2020 के विधान परिषद चुनाव में भाजपा ने छह, सपा ने तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटें जीती थीं। इस बार सपा की पांच सीटों पर जीत को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उसके बढ़े हुए राजनीतिक मनोबल के तौर पर देखा जा रहा है।
विधानसभा चुनाव से पहले सपा का बढ़ेगा मनोबल
सपा को सबसे अहम जीत लखनऊ स्नातक सीट पर मिली। यहां पार्टी की उम्मीदवार कांति सिंह ने भाजपा प्रत्याशी अवनीश कुमार सिंह को 14,855 वोटों से हराया। कांति सिंह को कुल 51,168 वोट मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 36,313 वोट हासिल हुए।
वहीं, आगरा शिक्षक सीट पर आकाश अग्रवाल ने 14,046 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। यह सीट पहले निर्दलीय उम्मीदवार के पास थी। इन नतीजों से सपा को शिक्षकों और स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिला है।
शिक्षक सीटों पर भाजपा का दबदबा बरकरार
विधान परिषद की शिक्षक सीटों पर भाजपा ने अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी। प्रदेश की छह शिक्षक सीटों में से चार पर भाजपा और दो पर सपा ने जीत हासिल की।
भाजपा के उमेश द्विवेदी ने लखनऊ सीट, श्रीचंद शर्मा ने मेरठ सीट और हरि सिंह ढिल्लों ने बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर जीत दर्ज की। वहीं, कड़े मुकाबले में ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर बाजी मारी।
सपा की जीत पर अखिलेश यादव ने क्या कहा?
विधानसभा चुनाव से पहले मिली इस जीत को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पार्टी के लिए अहम मान रहे हैं। वह जल्द ही वाराणसी का दौरा कर सकते हैं। अखिलेश का कहना है कि भाजपा की हार शिक्षकों, छात्रों और शिक्षा से जुड़ी सरकार की नीतियों की हार है। उन्होंने दावा किया कि शिक्षित बेरोजगार स्नातकों ने भी भाजपा के खिलाफ अपना फैसला सुनाया है।
अखिलेश यादव ने चुनाव में हेरफेर का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी पार्टी का कोई भी उम्मीदवार वास्तव में नहीं हारा है। उनके मुताबिक, उम्मीदवार भाजपा की कथित हेरफेर के कारण जीत का प्रमाणपत्र हासिल नहीं कर सके। उन्होंने कहा कि पार्टी ऐसे उम्मीदवारों को बिना प्रमाणपत्र के भी विजेता मानती है।
विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनने का रास्ता साफ?
पांच सीटों पर जीत के बाद विधान परिषद में सपा की कुल सदस्य संख्या 12 होने की बात कही गई है। नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए कम से कम 10 सदस्यों की जरूरत होती है। ऐसे में सपा इस पद पर अपना दावा मजबूत कर सकती है।
विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष का पद मिलने से सपा को सदन में सरकार को घेरने और अपनी राजनीतिक आवाज बुलंद करने का अवसर मिलेगा। विधानसभा चुनाव से पहले यह उपलब्धि पार्टी के लिए अहम साबित हो सकती है। वहीं, भाजपा के लिए विपक्ष की बढ़ती ताकत एक नई चुनौती बन सकती है।