नई दिल्ली: दोस्त को कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए अदालत में झूठी जानकारी देना एक व्यक्ति को महंगा पड़ गया। दिल्ली की एक अदालत ने गैरहाजिर आरोपी को मृत बताने वाले उसके जमानती दोस्त के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। पुलिस जांच में आरोपी जीवित मिला, जिसके बाद अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह करने का गंभीर मामला माना।
मामला वर्ष 2017 में दर्ज एक आपराधिक केस से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई साकेत कोर्ट में चल रही है। पुलिस के अनुसार संगम विहार निवासी रविंद्र उर्फ लाला को जमानत मिलने के बाद अदालत में नियमित रूप से पेश होना था, लेकिन वह बाद में सुनवाई से अनुपस्थित रहने लगा।
जब 9 अक्टूबर 2025 को आरोपी अदालत में पेश नहीं हुआ तो कोर्ट ने उसके जमानती धन्ना लाल को तलब किया। सुनवाई के दौरान धन्ना लाल ने दावा किया कि रविंद्र की मौत हो चुकी है। इस पर अदालत ने संबंधित थाना प्रभारी से रिपोर्ट मांगी।
पुलिस जांच में खुली सच्चाई
पुलिस की जांच में सामने आया कि रविंद्र की मौत नहीं हुई थी, बल्कि वह फरार था। रिपोर्ट अदालत में पेश होने के बाद स्पष्ट हो गया कि आरोपी के बारे में गलत जानकारी दी गई थी।
इसके बाद अदालत ने माना कि जमानती ने जानबूझकर झूठा बयान देकर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की। कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए संबंधित धाराओं में मामला दर्ज करने के निर्देश दिए।
अदालत के आदेश पर दर्ज हुआ मुकदमा
अदालत के निर्देश के बाद साकेत थाना पुलिस ने 9 जुलाई को धन्ना लाल के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि आरोपी को मृत बताने के पीछे उसकी मंशा क्या थी और क्या इसके पीछे कोई सुनियोजित साजिश थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सुनाया अहम फैसला
इसी बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में कहा है कि किसी आपराधिक मुकदमे में यदि सह-आरोपी सरकारी गवाह बनकर माफी मांगता है, तो दूसरे आरोपी को उस अर्जी का विरोध करने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सुनवाई के दौरान दूसरे आरोपी को सरकारी गवाह बने सह-आरोपी से जिरह करने का पूरा अवसर मिलता है। इसलिए माफी देने की प्रक्रिया से उसके अधिकारों का सीधा हनन नहीं माना जा सकता।