गंगा की सफाई में हाईटेक क्रांति! अब ड्रोन रखेंगे हर नाले पर नजर, गंगोत्री से गंगासागर तक होगी डिजिटल मैपिंग

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वाराणसी: गंगा को स्वच्छ, निर्मल और अविरल बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और तकनीकी कदम उठाया है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने गंगा में मिलने वाले प्राकृतिक और मानव निर्मित नालों की सटीक पहचान, निगरानी और जियोटैगिंग के लिए ड्रोन आधारित सर्वेक्षण की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को मंजूरी दे दी है। इस पहल के जरिए प्रदूषण के स्रोतों का वैज्ञानिक तरीके से पता लगाया जाएगा और उन पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाएगी।

मिशन की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार, गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा नदी के दोनों किनारों पर मौजूद जल निकासी तंत्र का विस्तृत हवाई सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी कराई जाएगी। इस प्रक्रिया के तहत एक आधुनिक जीआईएस आधारित वेब एप्लीकेशन और ड्रेन डिसीजन सपोर्ट सिस्टम विकसित किया जाएगा, जिससे नदी में गिरने वाले नालों की पूरी जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी।

यूपी समेत पांच राज्यों में चलेगा विशेष अभियान

इस परियोजना के तहत उत्तर प्रदेश के भीतर लगभग 2,200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चिन्हित किया गया है। गंगा के दोनों किनारों से 200-200 मीटर के दायरे में आने वाले सभी छोटे-बड़े नालों और जल स्रोतों का उच्च गुणवत्ता वाला द्वि-आयामी और त्रि-आयामी डेटा तैयार किया जाएगा। यह व्यवस्था नालों को उनके शुरुआती स्रोत से लेकर गंगा में मिलने वाले अंतिम बिंदु तक ट्रैक करने में सक्षम होगी।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने उत्तर प्रदेश के साथ-साथ उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के राज्य स्वच्छ गंगा मिशनों को भी इस एसओपी को तत्काल लागू करने के निर्देश दिए हैं। राज्यों से कहा गया है कि सर्वेक्षण पूरा होने के बाद सभी उच्च-रिजॉल्यूशन आर्थोफोटो, जीआईएस डेटा और वीडियो रिकॉर्ड एनएमसीजी के साथ साझा किए जाएं।

केंद्रीय ड्रेन डैशबोर्ड से होगी निगरानी

सर्वेक्षण से प्राप्त सभी आंकड़ों को एक केंद्रीय ड्रेन डैशबोर्ड और राष्ट्रीय डेटाबेस से जोड़ा जाएगा। इससे गंगा में गिरने वाले नालों की रियल टाइम निगरानी संभव हो सकेगी और भविष्य में नदी संरक्षण से जुड़ी योजनाओं और नीतियों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा।

हर नाले को मिलेगा यूनिक पहचान कोड

नई व्यवस्था के तहत गंगा में गिरने वाले हर नाले की जियोटैगिंग की जाएगी और उसे एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जाएगी। सर्वेक्षण में एक मीटर से कम चौड़ाई वाले छोटे नाले, एक से तीन मीटर चौड़ाई वाले मध्यम नाले और तीन मीटर से अधिक चौड़ाई वाले बड़े नालों को शामिल किया जाएगा।

ड्रोन सर्वे के लिए तय किए गए सख्त मानक

सर्वेक्षण की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए विस्तृत तकनीकी मानक निर्धारित किए गए हैं। ड्रोन को जमीन से लगभग 80 मीटर की ऊंचाई पर उड़ाया जाएगा और इसकी गति 25 से 30 किलोमीटर प्रति घंटा रखी जाएगी। सर्वेक्षण के दौरान ड्रोन हर सेकंड तस्वीरें रिकॉर्ड करेगा। वहीं, नालों के पूरे कॉरिडोर की निगरानी के लिए 70 से 80 मीटर की ऊंचाई से 4के रिजॉल्यूशन में तिरछी वीडियोग्राफी भी की जाएगी।

प्रदूषण पर लगेगी लगाम, गंगा संरक्षण को मिलेगा नया आधार

विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन आधारित यह व्यापक मैपिंग अभियान गंगा में प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों की पहचान को आसान बनाएगा। इससे नालों की निगरानी, उपचार और प्रबंधन की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी होगी, जिससे गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के राष्ट्रीय अभियान को नई गति मिलने की उम्मीद है।

 

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