OTT: साउथ की 8.3 रेटिंग वाली क्राइम थ्रिलर, सीधी कहानी पसंद है तो इस फिल्म से रहें दूर; हर किरदार बताएगा अलग सच

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मुंबई: साउथ की कई फिल्में अपनी अलग कहानी और शानदार प्रस्तुति के लिए जानी जाती हैं। कन्नड़ की क्राइम थ्रिलर फिल्म ‘उलिदावरु कंदंते’ भी ऐसी ही फिल्मों में शामिल है। 2014 में आई इस फिल्म की IMDb रेटिंग 8.3 है। इसकी कहानी एक सीधी लकीर में आगे नहीं बढ़ती, बल्कि एक ही घटना को अलग-अलग किरदारों के नजरिए से दिखाया जाता है। यही वजह है कि फिल्म देखने के दौरान आपको हर बार कहानी का एक नया पहलू समझ में आता है।

क्या है फिल्म की कहानी

फिल्म की शुरुआत मालपे के एक इलाके में जन्माष्टमी के दौरान हुई चोरी और हत्या से होती है। इसके बाद एक पत्रकार इस घटना की सच्चाई जानने के लिए अलग-अलग लोगों से बातचीत करता है।

धीरे-धीरे पांच लोगों की पांच अलग-अलग कहानियां सामने आती हैं। सभी उसी घटना को अपने नजरिए से बताते हैं। एक किरदार की बात सुनकर जो कहानी सही लगती है, दूसरे किरदार के नजरिए के बाद उसका मतलब बदल जाता है। यहीं से फिल्म का असली रहस्य शुरू होता है।

रक्षित शेट्टी ने लिखी और डायरेक्ट की फिल्म

‘उलिदावरु कंदंते’ को रक्षित शेट्टी ने लिखा और निर्देशित किया है। वह फिल्म में रिची नाम का किरदार भी निभाते हैं। कहानी कहने का तरीका फिल्म की सबसे खास बातों में से एक है।

फिल्म दर्शकों को सीधे-सीधे जवाब देने के बजाय धीरे-धीरे घटनाओं की अलग-अलग परतें खोलती है। इसलिए इसे देखने के लिए कहानी पर ध्यान देना जरूरी है। अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जिन्हें मोबाइल चलाते हुए भी आसानी से समझ लिया जाए, तो इसका अंदाज आपको अलग लग सकता है।

रिची के किरदार में रक्षित शेट्टी

फिल्म में रक्षित शेट्टी का रिची वाला किरदार खास तौर पर ध्यान खींचता है। रेट्रो चश्मा, अलग तरह के कपड़े और बेफिक्र अंदाज उसके व्यक्तित्व को अलग बनाते हैं। उसका अगला कदम क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है।

रिची को न तो सामान्य फिल्मी विलेन के तौर पर दिखाया गया है और न ही वह सीधा-सादा हीरो है। यही अस्पष्टता उसके किरदार को दिलचस्प बनाती है। वहीं ऋषभ शेट्टी ने भी अपने अभिनय से फिल्म में प्रभाव छोड़ा है।

कर्नाटक की संस्कृति भी कहानी का हिस्सा

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी कहानी के माहौल को मजबूत करती है। जन्माष्टमी का उत्सव, पिली वेषा यानी टाइगर डांस, यक्षगान, मछुआरों की जिंदगी और स्थानीय भाषा को कहानी में प्रमुखता से शामिल किया गया है।

इन चीजों की वजह से फिल्म सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं लगती, बल्कि मालपे और वहां के स्थानीय माहौल को भी करीब से दिखाती है।

म्यूजिक ने बढ़ाया रहस्य का माहौल

फिल्म के बैकग्राउंड म्यूजिक की भी अहम भूमिका है। बी. अजनीश लोकनाथ ने पारंपरिक कन्नड़ संगीत और आधुनिक ध्वनि का मेल किया है। इससे फिल्म में मौजूद रहस्य और असामान्य माहौल और गहरा होता है।

किन लोगों को पसंद आ सकती है फिल्म

अगर आपको हीरो-विलेन की सीधी कहानी और जल्दी खुलने वाला रहस्य पसंद है, तो ‘उलिदावरु कंदंते’ का तरीका आपको उलझा हुआ लग सकता है। लेकिन अलग-अलग नजरिए से एक ही घटना को समझने वाली कहानियां पसंद करने वालों के लिए यह फिल्म दिलचस्प अनुभव हो सकती है।

‘पल्प फिक्शन’ और ‘राशोमोन’ जैसी फिल्मों की कहानी कहने की शैली पसंद करने वाले दर्शकों को भी इसका अंदाज अलग लग सकता है। फिल्म में मर्डर मिस्ट्री के साथ कहानी, किरदार और कर्नाटक की संस्कृति को भी साथ लेकर चला गया है।

 

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