हिमाचल में घेपन झील का बढ़ता खतरा, 32 संवेदनशील जगहों पर होगी निगरानी; सितंबर में लगेगा प्रारंभिक चेतावनी तंत्र
केलांग: नेपाल में चीन के कब्जे वाले तिब्बत क्षेत्र की पहाड़ियों में ग्लेशियर फटने से आई बाढ़ के बाद हिमाचल प्रदेश का लाहौल-स्पीति प्रशासन भी सतर्क हो गया है। जिला प्रशासन 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियल झील के जलस्तर और अन्य महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी कर रहा है। अहम बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में झील का आकार 173 फीसदी तक बढ़ चुका है।
प्रशासन के मुताबिक, घेपन झील के पास प्रारंभिक चेतावनी तंत्र लगाने की तैयारी है। उपायुक्त किरण भड़ाना ने बताया कि सी-डैक, तिरुवनंतपुरम के माध्यम से झील पर यह प्रणाली स्थापित की जाएगी। इसे सितंबर महीने में स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है।
सिस्सू झील पर प्रणाली का सफल परीक्षण
उपायुक्त ने बताया कि सी-डैक की ओर से सिस्सू झील पर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का परीक्षण सफलतापूर्वक किया जा चुका है। परीक्षण के दौरान झील से जुड़े जरूरी आंकड़े और सूचनाएं सफलतापूर्वक प्राप्त की गईं। इसी तकनीक के आधार पर घेपन झील में भी निगरानी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
हालांकि, इसके लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अंतिम स्वीकृति आदेश मिलना अभी बाकी है।
14 दिन तक वैज्ञानिक अध्ययन करेगी विशेषज्ञ टीम
घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित खतरों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पांच विशेषज्ञों की टीम 1 सितंबर 2026 को झील क्षेत्र का दौरा करेगी। विशेषज्ञ लगभग 14 दिनों तक इलाके में रहकर झील और आसपास के क्षेत्रों का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण करेंगे।
इस दौरान झील क्षेत्र का मानचित्रण, हिमस्खलन और भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों की पहचान, झील की गहराई, जल प्रवाह और मौसम से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया जाएगा। इस अध्ययन के आधार पर तैयार विस्तृत रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सौंपी जाएगी।
इसके अलावा जिला प्रशासन सितंबर में अपनी एक अलग टीम भी घेपन झील की मौजूदा स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण करने के लिए भेजेगा।
इसरो ने नवंबर 2023 में किया था अलर्ट
उपायुक्त किरण भड़ाना के मुताबिक, नवंबर 2023 में इसरो ने विभिन्न माध्यमों से जिला प्रशासन को घेपन झील के बढ़ते आकार की जानकारी दी थी। इसरो ने बताया था कि झील का आकार सामान्य स्तर की तुलना में काफी बढ़ गया है और संभावित खतरे को देखते हुए एहतियाती कदम उठाने की सलाह दी थी।
इसके बाद जुलाई 2024 में तत्कालीन उपायुक्त के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के 23 अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम ने 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन झील का दौरा किया था। टीम ने झील के संभावित रूप से फटने की स्थिति और उससे होने वाले नुकसान को कम करने के उपायों का विस्तृत अध्ययन किया था। इसकी रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भी सौंपी गई थी।
झील फटी तो सिस्सू से अंतिम सीमा तक खतरा
प्रशासन का कहना है कि विशेषज्ञों की ओर से सुझाए गए उपायों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। उद्देश्य संभावित आपदा की स्थिति में जन-धन की हानि को न्यूनतम करना और प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते बचाव एवं राहत अभियान शुरू करना है।
संभावित रूप से घेपन झील फटने की स्थिति में सिस्सू से हिमाचल प्रदेश की अंतिम सीमा तक 34 स्थानों को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से समय-समय पर आपदा से बचाव, त्वरित प्रतिक्रिया और जरूरी सावधानियों को लेकर जागरूक एवं प्रशिक्षित किया जा रहा है।
सिस्सू और शाशिन गांव में स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दल भी गठित किए गए हैं। आपदा जोखिम कम करने से जुड़े कार्यों में तेजी लाने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अतिरिक्त वित्तीय सहायता की मांग भी की गई है।
32 संवेदनशील स्थानों पर लगेगा हाई फ्लड लेवल निशान
घेपन झील सिस्सू से करीब 11 किलोमीटर दूर है। वहीं, झील से उदयपुर होते हुए जिले की अंतिम सीमा तक की दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। संभावित बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए जिले के संवेदनशील इलाकों में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के तहत हाई फ्लड लेवल मार्किंग का काम शुरू किया गया है।
इसके लिए कुल 32 स्थानों की पहचान की गई है। इसका उद्देश्य संभावित बाढ़ के स्तर को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना और जमीन पर एक स्पष्ट एवं स्थायी संदर्भ बिंदु उपलब्ध कराना है। इन स्थानों पर निशान लगने से सामान्य और संभावित बाढ़ के स्तर का स्पष्ट संकेत मिलेगा। इससे नदी किनारे रहने वाले लोगों को खतरे की जानकारी मिलने के साथ आपदा की स्थिति में तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया मजबूत करने में मदद मिलेगी।
GLOF निगरानी के लिए बनेगी विशेष समिति
जिला प्रशासन की ओर से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ की निगरानी के लिए जिला स्तर पर एक विशेष समिति का गठन भी किया जा रहा है। इसमें विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ पर्वतारोहण और संबंधित क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को शामिल किया जाएगा।
समिति समय-समय पर घेपन झील और आसपास के इलाकों का स्थलीय निरीक्षण करेगी। इस दौरान ढीली चट्टानों, अस्थिर भू-भाग और अन्य संभावित खतरों का आकलन किया जाएगा। समिति जोखिम कम करने की रणनीति, जरूरी शमन उपाय और आपदा की स्थिति में प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर भी काम करेगी।
उपायुक्त किरण भड़ाना ने कहा कि जिला प्रशासन वैज्ञानिक निगरानी, विशेषज्ञों के अध्ययन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक प्रशिक्षण और विभागीय समन्वय के जरिए घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े संभावित जोखिमों को कम करने के लिए लगातार काम कर रहा है। प्रशासन की प्राथमिकता संभावित आपदा से पहले प्रभावी तैयारी सुनिश्चित करना और किसी भी आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है।