देश में तेजी से बढ़ रही डायबिटीज और मानसिक तनाव की समस्या, हर 10 में करीब 4 लोगों में सामने आई चिंता

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नई दिल्ली: देश में डायबिटीज और मानसिक तनाव जैसी स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर हालिया हेल्थ डेटा ने चिंता बढ़ाई है। आंकड़ों के मुताबिक बड़ी संख्या में लोगों में ब्लड शुगर सामान्य से अधिक पाया गया है। वहीं करीब 40 फीसदी लोगों ने पिछले एक सप्ताह के दौरान अपने मानसिक तनाव का स्तर काफी ज्यादा बताया। डेटा से यह भी सामने आया है कि लोगों की आर्थिक स्थिति का असर स्वास्थ्य जांच कराने की उनकी क्षमता पर पड़ रहा है।

Workforce Health Index 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 10 में से करीब 4 लोगों की जांच रिपोर्ट में ब्लड शुगर बढ़ा हुआ पाया गया। कुल 7,088 लोगों की HbA1c जांच रिपोर्ट में 38.7 फीसदी रिपोर्ट ऐसी थीं, जिनमें ब्लड शुगर का स्तर प्री-डायबिटीज या डायबिटीज की स्थिति में था।

HbA1c एक रक्त जांच है, जिससे पिछले करीब 2 से 3 महीनों के दौरान शरीर में ब्लड शुगर के औसत स्तर का पता लगाया जाता है। इस वजह से यह जांच लंबे समय तक ब्लड शुगर नियंत्रण की स्थिति समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

10 में करीब 4 लोगों ने बताया मानसिक तनाव का स्तर ज्यादा

ब्लड शुगर के साथ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी आंकड़े सामने आए हैं। कुल 7,346 लोगों में से 40.4 फीसदी लोगों ने बताया कि पिछले एक सप्ताह में उनके शरीर में मानसिक तनाव का स्तर बहुत ज्यादा रहा। यानी बड़ी संख्या में लोगों ने खुद को काफी अधिक मानसिक तनाव महसूस होने की जानकारी दी।

स्वास्थ्य बीमा के दावों में परिवार की हिस्सेदारी ज्यादा

आंकड़ों में स्वास्थ्य बीमा से जुड़े दावों को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। कुल दावों में 66.5 फीसदी दावे कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों से जुड़े थे, जबकि कर्मचारियों से संबंधित दावों की हिस्सेदारी 33.5 फीसदी रही।

यह आंकड़ा दिखाता है कि स्वास्थ्य बीमा का इस्तेमाल केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के सदस्य भी बड़ी संख्या में कर रहे हैं।

आय बढ़ने के साथ फुल-बॉडी हेल्थ टेस्ट कराने वालों की संख्या बढ़ी

स्वास्थ्य जांच को लेकर लोगों की आर्थिक स्थिति में बड़ा अंतर भी सामने आया। सालाना 3 लाख रुपये से कम आय वाले लोगों में सिर्फ 15.6 फीसदी ने फुल-बॉडी डायग्नोस्टिक टेस्ट कराने की जानकारी दी।

वहीं, 40 लाख रुपये या उससे अधिक सालाना आय वाले लोगों में फुल-बॉडी डायग्नोस्टिक टेस्ट कराने वालों की हिस्सेदारी बढ़कर 54.3 फीसदी हो गई। आंकड़ों से पता चलता है कि अधिक आय वाले वर्ग में व्यापक स्वास्थ्य जांच कराने की प्रवृत्ति ज्यादा है।

 

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