मैटरनिटी लीव के बाद पद या जिम्मेदारी छीनी तो कंपनी की खैर नहीं! दिल्ली HC का सख्त फैसला, महिला कर्मचारी को 11.5 लाख रुपये देने का आदेश

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नई दिल्ली: मैटरनिटी लीव से लौटने वाली महिला कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि गर्भावस्था या प्रसूति अवकाश के कारण किसी महिला कर्मचारी को उसके करियर में नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। सामान्य स्थिति में महिला को उसी पद और जिम्मेदारियों पर वापस लौटाया जाना चाहिए, जिस पर वह मैटरनिटी लीव पर जाने से पहले काम कर रही थी।

अगर किसी ठोस कारण से उसी पद पर वापस लाना संभव नहीं है, तो कर्मचारी को समान वेतन, पद, दर्जा, वरिष्ठता, जिम्मेदारियों और करियर के अवसरों वाली बराबर की भूमिका दी जानी चाहिए।

31 अगस्त 2026 को जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 के तहत मामले की सुनवाई करते हुए कंपनी को महिला कर्मचारी को 10 लाख रुपये मुआवजे के तौर पर और 1.5 लाख रुपये कानूनी खर्च के रूप में देने का आदेश दिया। रकम 8 सप्ताह के भीतर नहीं चुकाने पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।

14 साल का अनुभव, 2022 में बनी थीं मैनेजर

याचिकाकर्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और उनके पास करीब 14 साल का पेशेवर अनुभव है। वर्ष 2022 में उन्हें एक कंपनी में मैनेजर-अकाउंटिंग के पद पर नियुक्त किया गया था। उस समय उनकी मासिक सैलरी करीब 2.6 लाख रुपये थी।

मई 2023 में उन्होंने कंपनी को अपनी गर्भावस्था की जानकारी दी। इसके बाद उन्हें दूसरी टीम में स्थानांतरित कर दिया गया। दिसंबर 2023 में वह मैटरनिटी लीव पर चली गईं और जुलाई 2024 में काम पर वापस लौटीं।

पुराना पद नहीं मिला, ट्रेजरी विभाग भेजा गया

महिला ने आरोप लगाया कि मैटरनिटी लीव से वापस आने के बाद उन्हें पुराना पद और जिम्मेदारियां नहीं दी गईं। इसके बजाय उन्हें ट्रेजरी विभाग में भेज दिया गया, जहां उनके अधीन कोई कर्मचारी नहीं था।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें लंबे समय तक मैनेजरों की बैठकों से अलग रखा गया। वहीं, पुरुष सहयोगियों को सीनियर मैनेजर के पद पर पदोन्नत किया गया, लेकिन उन्हें उनकी पुरानी पेशेवर भूमिका में वापस नहीं लाया गया।

महिला ने कंपनी में बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच की सुविधा नहीं होने की भी शिकायत की। आखिरकार उन्होंने अक्टूबर 2024 में इस्तीफा दे दिया और दूसरी कंपनी में नौकरी शुरू कर दी।

कंपनी ने सभी आरोपों से किया इनकार

कंपनी ने महिला के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनके पद, स्तर और वेतन में कोई बदलाव नहीं किया गया था। कंपनी के मुताबिक, वह मैनेजर-अकाउंटिंग के उसी स्तर पर बनी हुई थीं।

कंपनी ने यह भी कहा कि ट्रेजरी विभाग में उनका स्थानांतरण अस्थायी था और संगठनात्मक बदलाव तथा कारोबारी जरूरतों के चलते किया गया था। कंपनी का दावा था कि महिला को वेतन वृद्धि के साथ मैटरनिटी से जुड़े सभी कानूनी लाभ भी दिए गए थे।

मैटरनिटी बेनिफिट सिर्फ छुट्टी तक सीमित नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ने कहा कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 की धारा 12 के तहत महिला को मिलने वाली सुरक्षा केवल प्रसूति अवकाश के दौरान नौकरी से निकाले जाने से बचाने तक सीमित नहीं है।

अदालत के मुताबिक, मैटरनिटी लीव से लौटने के बाद महिला को सामान्य तौर पर उसी पद पर बहाल किया जाना चाहिए, जिस पर वह छुट्टी पर जाने से पहले कार्यरत थी।

यदि किसी ठोस वजह से ऐसा संभव नहीं है, तो वैकल्पिक पद में वेतन, दर्जा, वरिष्ठता, जिम्मेदारियां, प्रबंधकीय अधिकार, निर्णय लेने की शक्ति, पदोन्नति के अवसर और करियर की संभावनाएं काफी हद तक समान होनी चाहिए।

बदलाव करना हो तो कर्मचारी को पहले बताना जरूरी

हाई कोर्ट ने नियोक्ताओं के लिए भी अहम निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यदि मैटरनिटी लीव के दौरान किसी कर्मचारी की जिम्मेदारियों, वेतन, ग्रेड, रिपोर्टिंग व्यवस्था, टीम या कार्यस्थल में कोई बड़ा बदलाव किया जाता है, तो कर्मचारी को इसकी जानकारी पहले ही दी जानी चाहिए।

 

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