यूपी पुलिस कांस्टेबल को नियुक्ति के 20 दिन बाद हटाया, हाईकोर्ट ने दी बड़ी राहत; सिर्फ मुकदमा दर्ज होना अयोग्यता का आधार नहीं

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प्रयागराज: यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती के एक अभ्यर्थी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसे पुलिस सेवा में नियुक्ति के लिए स्वतः अयोग्य नहीं माना जा सकता। मामले की प्रकृति और उससे जुड़ी परिस्थितियों को देखते हुए अभ्यर्थी की योग्यता का आकलन किया जाना जरूरी है। इसी आधार पर कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर दी।

कोर्ट ने कहा कि केवल मुकदमा दर्ज होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को यांत्रिक तरीके से पुलिस सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता। ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होते ही उसे स्वतः नियुक्ति के लिए अयोग्य मान लिया जाए।

पोस्टिंग के 20 दिन बाद ही सेवा से हटाया

मामला अलीगढ़ में पुलिस कांस्टेबल के पद पर चयनित एक अभ्यर्थी से जुड़ा है। चयन के बाद उसे प्रशिक्षण के लिए फिरोजाबाद भेजा गया था। उसने आठ अक्टूबर 1997 को वहां कार्यभार संभाला। इसके करीब 20 दिन बाद उसे यह कहते हुए सेवा से हटा दिया गया कि चयन से पहले उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित था और उसने इसकी जानकारी नहीं दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध की प्रकृति और मामले से जुड़ी सभी परिस्थितियों पर विचार करना जरूरी है। हल्के अपराधों में केवल मुकदमा दर्ज होना पुलिस बल में नियुक्ति के लिए अयोग्यता का आधार नहीं बन सकता।

समझौते के आधार पर बाद में हुआ बरी

अभ्यर्थी को बाद में समझौते के आधार पर मामले में बरी कर दिया गया। उसका कहना था कि 24 जुलाई 1997 को जब उसने किसी आपराधिक मामले में शामिल नहीं होने संबंधी शपथपत्र दिया था, तब उसे इस मुकदमे की जानकारी नहीं थी। उसके मुताबिक मामले का पता उसे समझौते से दो या तीन दिन पहले ही चला था।

राज्य सरकार ने इसके विपरीत दलील दी कि अभ्यर्थी ने गलत शपथपत्र दिया था। सरकार के अनुसार उसके खिलाफ वर्ष 1994 में बलवा, मारपीट और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था और चयन के समय यह मामला लंबित था।

एकल पीठ ने पहले ही रद्द कर दिया था सेवा समाप्ति का आदेश

इस मामले में एकल पीठ ने पहले अभ्यर्थी को सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया था। कोर्ट ने बिना पिछला वेतन दिए सेवा की निरंतरता के साथ उसकी बहाली का निर्देश दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने विशेष अपील दाखिल की थी।

खंडपीठ ने इस सवाल पर भी विचार किया कि क्या अभ्यर्थी को मुकदमे की जानकारी थी। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में एफआईआर दर्ज होने की तारीख स्पष्ट नहीं थी। इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उस समय अभ्यर्थी की उम्र क्या थी।

कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी नियोक्ता की थी कि अभ्यर्थी ने जमानत के लिए आवेदन किया था, जांच में शामिल हुआ था या मुकदमे की कार्यवाही में हिस्सा लिया था। इन परिस्थितियों से यह साबित किया जा सकता था कि उसे मामले की जानकारी थी। लेकिन राज्य की ओर से ऐसा कोई ठोस आधार पेश नहीं किया गया।

जघन्य अपराध नहीं होने को भी कोर्ट ने माना अहम

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित अपराध समझौता योग्य थे। इनमें नैतिक पतन के अपराध या हत्या, डकैती और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध शामिल नहीं थे।

कोर्ट ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि अभ्यर्थी को मुकदमे की जानकारी थी, तब भी केवल इसी आधार पर उसकी अभ्यर्थना रद्द नहीं की जा सकती थी। पुलिस मुख्यालय और फिरोजाबाद के पुलिस अधीक्षक ने मामले में यांत्रिक तरीके से कार्रवाई की और अभ्यर्थी की व्यक्तिगत परिस्थितियों तथा आरोपों की प्रकृति का उचित आकलन नहीं किया। खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले से सहमति जताई और अतिरिक्त कारणों के साथ राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर दी।

 

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