दिन में सोना और रातभर जागना पड़ सकता है भारी! बिगड़ती जैविक घड़ी से नींद ही नहीं, दिल, दिमाग और मेटाबॉलिज्म पर भी खतरा

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नई दिल्ली: देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप चलाना, रात की पाली में काम करना और सप्ताहांत में सोने-जागने का समय बदल देना अब आम दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन अनियमित जीवनशैली शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकती है। इसका असर केवल नींद तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हृदय, मस्तिष्क, पाचन, चयापचय और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक सोने-जागने का समय लगातार बदलते रहने से शारीरिक स्वास्थ्य के साथ पारिवारिक जीवन और आपसी संबंध भी प्रभावित हो सकते हैं।

क्या है शरीर की जैविक घड़ी और क्यों जरूरी है इसका सही रहना?

मेडफर्स्ट ईएनटी सेंटर के संस्थापक, स्लीप विशेषज्ञ और ईएनटी सर्जन मेजर (सेवानिवृत्त) डॉ. राजेश भारद्वाज के अनुसार, शरीर की जैविक घड़ी नींद-जागने के चक्र के साथ हार्मोन, पाचन, चयापचय, हृदय प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी गतिविधियों को भी नियंत्रित करने में भूमिका निभाती है।

जब सोने-जागने का समय, रोशनी के संपर्क और भोजन की दिनचर्या बार-बार बदलती है, तो शरीर की प्राकृतिक लय प्रभावित हो सकती है। रात में जागने और दिन में सोने की आदत, खासकर जब यह लंबे समय तक बनी रहे, शरीर की सामान्य प्रक्रियाओं के साथ तालमेल बिगाड़ सकती है।

वर्ष 2024 में प्रकाशित एक चिकित्सीय समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 16 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया था। इसमें जैविक घड़ी और दिनचर्या के बीच असंतुलन का संबंध मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़े जोखिमों के साथ पाया गया।

मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त और ध्यान पर भी असर

मनोचिकित्सक और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (इहबास) के पूर्व निदेशक डॉ. निमिष जी. देसाई के अनुसार, पर्याप्त नींद न लेना या सही समय पर नींद नहीं आना मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। जैविक घड़ी में गड़बड़ी होने पर शरीर की कई प्रक्रियाओं पर असर पड़ने की आशंका रहती है।

लंबे समय तक अनियमित दिनचर्या रहने से रक्तचाप, रक्त शर्करा के नियंत्रण, एकाग्रता और याददाश्त पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नियमित समय पर सोना और जागना महत्वपूर्ण है। लगातार नींद की कमी या नींद के समय में बार-बार बदलाव होने पर इसे मामूली परेशानी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

अनियमित दिनचर्या कैसे बढ़ा सकती है घर में तनाव?

रात की पाली में काम करने वाले रमेश का उदाहरण बताता है कि अनियमित समय-सारिणी का असर परिवार पर भी पड़ सकता है। वह रात में काम करने के कारण दिन में सोता है और घर के कामकाज में हिस्सा नहीं ले पाता। परिवार को जब उसकी जरूरत होती है, तब वह आराम कर रहा होता है। वहीं, रात में उसकी गतिविधियों से घर के दूसरे सदस्यों की नींद प्रभावित होती है। धीरे-धीरे इससे घर का माहौल तनावपूर्ण हो गया।

इसी तरह, एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाली नेहा दोपहर में काम पर जाती है और रात में लौटने के बाद देर तक मोबाइल चलाती है। दोपहर तक सोने की आदत के कारण उसके लिए छुट्टी वाले दिन सुबह जल्दी उठना मुश्किल हो जाता है। इससे उसकी दिनचर्या सामान्य समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती।

सप्ताहांत में देर तक सोने से सोमवार की सुबह क्यों बनती है मुश्किल?

बीपीओ में काम करने वाले रोहित की दिनचर्या भी अनियमित नींद की समस्या को दर्शाती है। वह पूरे सप्ताह देर रात तक लैपटॉप पर काम करता है। शुक्रवार को दोस्तों के साथ देर तक जागने के बाद शनिवार को दोपहर तक सोता है। इसके बाद रविवार रात उसे समय पर नींद नहीं आती और सोमवार सुबह उठने में परेशानी होती है।

ऐसे मामलों में सप्ताह के दिनों और छुट्टी के दिनों की नींद के समय में बड़ा अंतर शरीर की नियमित लय बनाए रखना कठिन कर सकता है।

जैविक घड़ी को संतुलित रखने के लिए क्या करें?

विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक, सोने और जागने का समय नियमित रखना, देर रात तक मोबाइल और लैपटॉप के इस्तेमाल को सीमित करना तथा भोजन और आराम की दिनचर्या में निरंतरता बनाए रखना उपयोगी हो सकता है। रात की पाली में काम करने वालों के लिए पर्याप्त और शांत वातावरण में नींद लेना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

यदि लंबे समय तक नींद आने में परेशानी हो, दिन में अत्यधिक नींद आए या थकान और एकाग्रता की समस्या बनी रहे, तो चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। नियमित दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के साथ बेहतर तालमेल बनाए रखने में मदद कर सकती है।

 

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