नई दिल्ली: रामायण से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा में रावण के अहंकार और उसके परिणाम का विस्तार से वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, लंका के राजा और महान शिव भक्त रावण अपने अहंकार के कारण कैलाश पर्वत पर नंदी का उपहास कर बैठा, जिसके बाद नंदी ने उसे श्राप दे दिया। माना जाता है कि यही श्राप आगे चलकर रावण और उसकी लंका के विनाश का कारण बना।
कैलाश पर रावण का अहंकार और नंदी का अपमान
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार रावण भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पहुंचा। वहां उसकी नजर शिव के वाहन नंदी पर पड़ी। रावण अपने अहंकार में नंदी के स्वरूप पर हंस पड़ा और उन्हें वानर जैसा कहकर अपमानित किया। इस अपमान से नंदी अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने रावण को श्राप दे दिया।
नंदी का श्राप और वानरों से विनाश की भविष्यवाणी
कथा के अनुसार, नंदी ने रावण को श्राप देते हुए कहा कि जिस वानर रूप का तुमने उपहास किया है, वही एक दिन तुम्हारे और तुम्हारी लंका के विनाश का कारण बनेगा। यह श्राप आगे चलकर रावण के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हनुमान की लंका यात्रा और विनाश की शुरुआत
जब रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें लंका में रखा, तब भगवान हनुमान सीता माता की खोज में लंका पहुंचे। वहां उन्होंने अशोक वाटिका में भारी उत्पात मचाया। इसके बाद जब रावण के आदेश पर उन्हें बंदी बनाया गया, तो उनकी पूंछ में आग लगा दी गई, जिससे उन्होंने पूरी स्वर्ण लंका को जला दिया।
राम-रावण युद्ध और लंका का अंत
अंततः भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध में रावण का वध हुआ। कथा के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में वानर सेना और हनुमान की भूमिका निर्णायक रही। यही कारण माना जाता है कि नंदी के श्राप के प्रभाव से रावण और उसकी लंका का अंत वानर रूपी शक्ति द्वारा हुआ।