‘आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करने पर घर को कोठा नहीं माना जा सकता’, सुप्रीम कोर्ट का 298 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 70 साल पुराने अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम पर महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 298 पन्नों के इस विस्तृत निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया कि वेश्यावृत्ति का उद्देश्य स्वयं इसे अपराध घोषित करना नहीं, बल्कि इसके व्यावसायीकरण और शोषण को रोकना है।

वेश्यावृत्ति और कानून के उद्देश्य पर अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वेश्यावृत्ति को समाप्त करना या उसे पूर्णतः अपराध बनाना नहीं है, बल्कि इसे एक संगठित व्यावसायिक गतिविधि के रूप में इस्तेमाल होने से रोकना है। अदालत ने कहा कि कानून का फोकस मुख्य रूप से तस्करी और शोषण करने वालों पर कार्रवाई करना है, न कि स्वयं वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को दंडित करना।

कानून में ‘अनैतिक’ शब्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कोर्ट ने अपने विश्लेषण में कहा कि 20वीं सदी के शुरुआती दौर में मानव तस्करी और महिलाओं के शोषण के कारण इस कानून में ‘अनैतिक’ शब्द जोड़ा गया था। उस समय समाज में इसे गंभीर सामाजिक बुराई माना जाता था, इसलिए यह शब्द कानून का हिस्सा बना।

व्यक्तिगत वेश्यावृत्ति को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टता
फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला अकेले अपने घर में अपनी आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करती है और उसमें किसी बिचौलिए या अन्य व्यक्तियों की संलिप्तता नहीं है, तो उसके घर को कानूनी रूप से ‘वेश्यागृह’ नहीं माना जाएगा।

धाराओं की व्याख्या और सीमाएं
पीठ ने बताया कि अधिनियम की धारा 7 और 8 कुछ विशेष परिस्थितियों में सार्वजनिक स्थानों के आसपास वेश्यावृत्ति से जुड़े मामलों को अपराध मानती हैं। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी गतिविधियों पर रोक इसलिए जरूरी है ताकि सामाजिक व्यवस्था और सार्वजनिक शालीनता बनी रहे।

कानूनी अस्पष्टता पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून की व्याख्या को लेकर कुछ अस्पष्टताएं जरूर हैं, क्योंकि इसे अक्सर केवल नकारात्मक या शोषणकारी संदर्भ में देखा जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विधायी मंशा सभी व्यक्तिगत कृत्यों को अपराध बनाना नहीं है, बल्कि शोषण और अनैतिक व्यापार पर रोक लगाना है।

 

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