45 साल बाद मिला इंसाफ, लेकिन बहुत देर से… सुप्रीम कोर्ट ने जिन 3 को बताया बेगुनाह, उनमें एक पूरी उम्रकैद काट चुका था

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नई दिल्ली: न्याय मिलने में हुई देरी का एक बेहद मार्मिक उदाहरण उत्तर प्रदेश के 1977 के चर्चित हत्या मामले में सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल बाद ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को बरी कर दिया। हालांकि, इस फैसले की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इनमें से एक आरोपी अपनी पूरी उम्रकैद की सजा पहले ही जेल में काट चुका था और बाद में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सजा माफ किए जाने के बाद ही उसकी रिहाई हो सकी।

1977 में हुए इस हत्या मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1981 में आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। कई दशकों तक चले कानूनी संघर्ष के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 28 जून 1977 को उत्तर प्रदेश में हुए एक हत्या कांड से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट के फैसले के बाद सभी आरोपियों को उम्रकैद की सजा मिली थी। समय बीतने के साथ इस मामले के दो आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि शेष तीन आरोपी न्याय के लिए अदालतों में लड़ाई लड़ते रहे।

इन तीन आरोपियों में से दो को वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन हीरा लाल की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। जमानत नहीं मिलने के कारण उसे पूरी उम्रकैद जेल में बितानी पड़ी। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सजा माफ किए जाने के बाद ही वह जेल से बाहर आ सका।

सुप्रीम कोर्ट ने किन आधारों पर किया बरी?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई के दौरान पुलिस की जांच और अभियोजन पक्ष की कहानी में कई गंभीर कमियां पाईं। अदालत ने गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभासों को देखते हुए तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

पीठ ने कथित प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पर भरोसा करने से इनकार करते हुए कहा कि बचाव पक्ष की दलीलें मजबूत हैं और उन्हें केवल काल्पनिक या अनुमान आधारित कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार घटना उस तरीके से हुई ही नहीं, जैसा पुलिस ने अपने मामले में प्रस्तुत किया था।

चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि घटना 28 जून 1977 की दोपहर उसी प्रकार हुई थी, जैसा कथित प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया है।

अदालत ने यह भी कहा कि जिन लोगों को चश्मदीद बताया गया, उनका घटनास्थल पर मौजूद होना बेहद संदिग्ध ही नहीं बल्कि लगभग असंभव प्रतीत होता है। ऐसे अविश्वसनीय और अनिश्चित साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन का मामला टिक नहीं सकता।

निचली अदालत और हाईकोर्ट की कार्यवाही पर भी टिप्पणी

शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही पर भी सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों अदालतों ने मामले की महत्वपूर्ण कमियों को नजरअंदाज किया और अत्यंत संदिग्ध गवाहों की गवाही के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहरा दिया। अदालत के अनुसार उपलब्ध परिस्थितियों में आरोपियों को दोषी ठहराने के बजाय संदेह का लाभ मिलना चाहिए था।

 

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