पीएम मोदी की काशी में BJP को फिर झटका, MLC की दोनों सीटें हारी पार्टी; अपनों की बेरुखी और भितरघात ने बढ़ाई चिंता

0 31

वाराणसी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर भाजपा को लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा है। इस बार हार का अंतर पहले से भी ज्यादा रहा। चुनाव नतीजों ने पार्टी संगठन की कार्यशैली, चुनावी रणनीति और नेताओं की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र के आठ जिलों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के एक केंद्रीय मंत्री समेत 11 मंत्री और 33 विधायक होने के बावजूद पार्टी दोनों सीटें नहीं बचा सकी।

इस हार को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी के भीतर भितरघात, नेताओं और कार्यकर्ताओं की उदासीनता तथा कमजोर चुनावी प्रबंधन ने नतीजों को प्रभावित किया। पार्टी नेता अब हार की समीक्षा करने की बात कह रहे हैं, लेकिन सवाल उठ रहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद हुई समीक्षा से क्या सबक लिया गया?

पदाधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं हुई

हाल के दिनों में भाजपा ने प्रदेश, काशी क्षेत्र, महानगर और जिला स्तर पर नए पदाधिकारियों की घोषणा की है। विभिन्न मोर्चों में भी नियुक्तियों का सिलसिला जारी है। इसके बावजूद एमएलसी चुनाव में किसी भी स्तर पर नेताओं या कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं की गई।

न तो चुनाव के लिए प्रभावी प्रभारी बनाए गए और न ही किसी नेता या कार्यकर्ता को प्रत्याशियों को जिताने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मुख्यमंत्री की दो जनसभाएं भी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में सफल नहीं रहीं।

जनप्रतिनिधियों की उदासीनता भी बनी वजह

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने काशी में दो दिन प्रवास किया था। इस दौरान उन्होंने जनप्रतिनिधियों, पूर्व जनप्रतिनिधियों, पदाधिकारियों और पुराने कार्यकर्ताओं के साथ अलग-अलग बैठकें की थीं। उन्होंने साफ कहा था कि एमएलसी चुनाव में जीत विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए अहम होगी। इसलिए सभी मतदाताओं तक पहुंचने की जरूरत है।

हालांकि, चुनाव परिणाम से संकेत मिला कि पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इन निर्देशों पर अपेक्षित तरीके से अमल नहीं किया। बड़े नेताओं और पदाधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद मतदाताओं तक पहुंचने में संगठन पीछे रह गया।

बैठकों तक ही सिमटकर रह गया चुनाव प्रचार

एमएलसी चुनाव में जीत के लिए भाजपा ने कई बैठकें कीं। शीर्ष नेताओं ने कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क करने और पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में वोट जुटाने के निर्देश दिए। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर प्रचार की सक्रियता सीमित रही।

वरुणापार के पांडेयपुर क्षेत्र के एक शिक्षक मतदाता ने बताया कि पार्टी के कई बड़े नेताओं से उनकी जान-पहचान है, लेकिन किसी ने भी उनसे भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में मतदान करने की अपील नहीं की। इससे चुनाव प्रचार की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

प्रत्याशियों के चयन में देरी से बढ़ी नाराजगी

भाजपा की हार की एक बड़ी वजह प्रत्याशियों की घोषणा में देरी को भी माना जा रहा है। पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन के लिए सभी जिलों से नाम मांगे थे। जनप्रतिनिधियों से राय ली गई और शीर्ष पदाधिकारियों ने सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपने स्तर पर भी जानकारी जुटाई।

इस प्रक्रिया में काफी समय लग गया। नतीजतन, कई महीने से चुनाव की तैयारी कर रहे दावेदारों में नाराजगी बढ़ गई। माना जा रहा है कि इसका असर चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ा।

इसके अलावा प्रत्याशियों का मतदाताओं से संपर्क भी कमजोर रहा। कई मतदाताओं तक उम्मीदवार मतदान के दिन तक नहीं पहुंच सके। इससे नाराज होकर पार्टी से जुड़े कुछ शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने मतदान से दूरी बना ली।

विपक्ष के खिलाफ लड़ने वाले को टिकट देने पर असंतोष

शिक्षक सीट पर भाजपा की ओर से डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र का नाम घोषित किए जाने के बाद कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में नाराजगी देखी गई। कुछ कार्यकर्ताओं का कहना था कि जो व्यक्ति लंबे समय तक भाजपा के खिलाफ चुनावी राजनीति करता रहा, उसे नामांकन से कुछ दिन पहले पार्टी का उम्मीदवार बना दिया गया।

कार्यकर्ताओं के मुताबिक, शिक्षक प्रत्याशी का चयन उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था। माना जा रहा है कि इस फैसले से संगठन के भीतर असंतोष बढ़ा और उसका असर चुनावी नतीजों पर भी पड़ा।

मतदाता सूची के पुनरीक्षण में भी पीछे रही भाजपा

चुनाव में हार की एक वजह मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर पार्टी की सुस्ती भी बताई जा रही है। निर्वाचन आयोग ने करीब एक साल पहले ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, लेकिन प्रत्याशी घोषित होने के इंतजार में पार्टी के कई दावेदार इस काम में सक्रिय नहीं हुए।

जब उम्मीदवारों के नाम घोषित हुए, तब तक काफी देर हो चुकी थी। इसके उलट विपक्षी दलों के नेता पहले से मतदाताओं के बीच सक्रिय थे। उन्होंने व्यक्तिगत संपर्क के साथ सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप के जरिए भी प्रचार किया। भाजपा की कमजोर तैयारी को हार का एक अहम कारण माना जा रहा है।

अवैध मतपत्रों की संख्या ने भी खड़े किए सवाल

मतगणना के दौरान भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में सबसे ज्यादा अवैध मतपत्र पाए जाने की बात सामने आई। इससे मतदान प्रक्रिया को लेकर मतदाताओं के बीच जागरूकता की कमी का संकेत मिला है।

बताया जा रहा है कि कई शिक्षक मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों के सामने वरीयता दर्ज करने में गलत तरीका अपनाया। इससे उनके मत अवैध हो गए। चुनाव से पहले प्रत्याशियों और पार्टी नेताओं की ओर से मतदाताओं को मतदान की प्रक्रिया ठीक से समझाई गई होती तो इस स्थिति से बचा जा सकता था।

 

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया Vnation के Facebook पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Leave A Reply

Your email address will not be published.