जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: राजा इन्द्रद्युम्न के सपने से शुरू हुई थी भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा की कथा, जानिए पूरा रहस्य

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पुरी: विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ आज से हो रहा है। इस पावन अवसर पर लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ की अद्वितीय प्रतिमा के निर्माण की कथा किस राजा से जुड़ी है और इसकी शुरुआत कैसे हुई थी।

पुराणों में वर्णित मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि वह उनके तीर्थ क्षेत्र में निवास करेंगे। इसी दौरान भगवान ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर अपनी प्रतिमा के निर्माण का मार्ग बताया।

राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में मिला भगवान विष्णु का आदेश

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक रात भगवान विष्णु के दर्शन की कामना करते हुए राजा इन्द्रद्युम्न भूमि पर कुश और वस्त्र बिछाकर विश्राम कर रहे थे। उसी दौरान उन्हें स्वप्न में भगवान विष्णु के दर्शन हुए। भगवान शंख, चक्र, गदा, धनुष और बाण धारण किए हुए गरुड़ पर विराजमान थे।

स्वप्न में भगवान ने राजा से कहा कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वे उन्हें अपनी प्रतिमा स्थापित करने का अवसर दे रहे हैं। भगवान ने निर्देश दिया कि सुबह समुद्र तट पर जाने पर उन्हें एक विशाल वृक्ष दिखाई देगा, जिसका एक भाग जल में और दूसरा भाग भूमि पर होगा। उसी दिव्य वृक्ष से उनकी प्रतिमा तैयार कराई जाए।

समुद्र तट पर मिला दिव्य वृक्ष, फिर तैयार हुई प्रतिमा

कथा के अनुसार, अगले दिन राजा इन्द्रद्युम्न समुद्र तट पहुंचे, जहां उन्हें भगवान के बताए अनुसार विशाल वृक्ष मिला। जब उन्होंने उस वृक्ष को काटा तो उसके भीतर दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। इसके बाद राजा ने देवशिल्पी विश्वकर्मा को भगवान के स्वरूप का वर्णन किया, जिसके आधार पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया।

रथ यात्रा में शामिल होने का क्या है धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होकर रथ की रस्सी खींचना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक रथ खींचते हैं, भगवान के दर्शन करते हैं और यात्रा मार्ग में प्रणाम करते हैं, उन्हें विशेष आध्यात्मिक फल की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के चलते हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस भव्य रथ यात्रा में शामिल होते हैं।

 

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