UN के नए नक्शे से बदलेगी दुनिया की तस्वीर! अफ्रीका दिखेगा और बड़ा, यूरोप-अमेरिका का घटेगा आकार

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नई दिल्ली: दुनिया को बचपन से जिस विश्व मानचित्र पर देखते और समझते आए हैं, उसमें महाद्वीपों का आकार वास्तविकता से काफी अलग नजर आता है। अब इस तस्वीर को बदलने की कोशिश की गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘इक्वल अर्थ’ नाम के नए विश्व मानचित्र को मंजूरी दी है। इस मानचित्र में महाद्वीपों के क्षेत्रफल को उनके वास्तविक आकार के ज्यादा करीब दिखाने का प्रयास किया गया है। प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि छह देश मतदान से दूर रहे। अमेरिका ने अकेले इसके खिलाफ वोट किया। नए मानचित्र में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया पहले की तुलना में बड़े दिखाई देंगे, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत छोटे नजर आएंगे।

मर्केटर नक्शे में अफ्रीका छोटा क्यों दिखता था?

इसके पीछे करीब 450 साल पुरानी नक्शा बनाने की तकनीक मानी जाती है। वर्ष 1569 में गेरार्डस मर्केटर ने ऐसा मानचित्र तैयार किया था, जिसे समुद्री यात्राओं के लिए बेहद उपयोगी माना गया। उस दौर में नाविक महीनों तक समुद्र के रास्ते यात्रा करते थे। ऐसे में मर्केटर ने ऐसी प्रक्षेपण तकनीक का इस्तेमाल किया, जिससे दिशाओं और समुद्री मार्गों को सीधी रेखाओं के रूप में समझना आसान हो गया। हालांकि, इसका असर धरती के वास्तविक आकार और नक्शे पर दिखाई देने वाले आकार के बीच अंतर के रूप में सामने आया।

गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर दिखाने की चुनौती

इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। संतरा गोल होता है, लेकिन उसके छिलके को उतारकर पूरी तरह सपाट सतह पर फैलाने की कोशिश करें तो वह कहीं न कहीं सिकुड़ेगा, खिंचेगा या फट जाएगा। इसी तरह पृथ्वी के गोल आकार को सपाट कागज पर दिखाने के दौरान भी आकार में बदलाव होना स्वाभाविक है।

मर्केटर प्रक्षेपण में भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्र जरूरत से ज्यादा बड़े दिखाई देने लगे। इसका असर यूरोप, उत्तरी अमेरिका और खास तौर पर ग्रीनलैंड पर पड़ा। इसके उलट भूमध्य रेखा के करीब स्थित अफ्रीका और भारत जैसे बड़े भूभाग नक्शे पर अपेक्षाकृत छोटे नजर आए।

अफ्रीका और ग्रीनलैंड इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं। वास्तविक क्षेत्रफल के लिहाज से अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है, लेकिन पुराने मर्केटर मानचित्र में दोनों लगभग समान आकार के दिखाई देते रहे।

समुद्री यात्राओं के लिए उपयोगी था पुराना नक्शा

मर्केटर मानचित्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इससे नाविकों को दिशा और समुद्री मार्ग समझने में काफी सुविधा होती थी। जहाजों की यात्राओं के लिए यह तकनीक उपयोगी साबित हुई, लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के वास्तविक क्षेत्रफल का अनुपात इसमें बिगड़ गया।

इसी वजह से लंबे समय से इस बात पर चर्चा होती रही है कि दुनिया को दिखाने के लिए ऐसा मानचित्र इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिसमें महाद्वीपों का क्षेत्रफल वास्तविकता के ज्यादा करीब हो।

‘इक्वल अर्थ’ में क्या होगा बदलाव?

‘इक्वल अर्थ’ प्रक्षेपण वर्ष 2018 में कुछ मानचित्र विशेषज्ञों ने तैयार किया था। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात के ज्यादा करीब दिखाना है।

इस प्रक्षेपण में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया का आकार पुराने मानचित्र की तुलना में बड़ा दिखाई देता है। वहीं यूरोप और उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।

इस बदलाव का मकसद सिर्फ नक्शे की शक्ल बदलना नहीं है। इसके पीछे यह प्रयास है कि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे और आम लोग दुनिया के विभिन्न देशों और महाद्वीपों के वास्तविक आकार को ज्यादा सही तरीके से समझ सकें।

164 देशों ने किया समर्थन, अमेरिका ने जताया विरोध

संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘इक्वल अर्थ’ से जुड़े प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जबकि अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।

इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने वालों में टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी भी शामिल थे। उनका कहना था कि नक्शे केवल भौगोलिक जानकारी देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों की शिक्षा, लोगों की कल्पना और दुनिया को देखने के नजरिए को भी प्रभावित करते हैं। उनके अनुसार, किसी क्षेत्र को उसके वास्तविक आकार से अलग दिखाने वाली तस्वीर लोगों के मन में लंबे समय तक गलत धारणा बना सकती है।

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के फैसले पर उठाए सवाल

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के इस कदम पर नाराजगी जताई। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेंसविच ने कहा कि ऐसे फैसलों की वजह से ही संयुक्त राष्ट्र अपनी साख खो रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दुनिया कई वास्तविक और गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है, तब संयुक्त राष्ट्र का समय 16वीं सदी के नक्शे पर चर्चा करने में क्यों खर्च किया जा रहा है।

अमेरिका के विरोध के बावजूद महासभा ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इसके बाद सदस्य देशों से पारंपरिक मर्केटर प्रक्षेपण की जगह ‘इक्वल अर्थ’ जैसे मानचित्र के इस्तेमाल की अपील की गई है। इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों के सामने दुनिया के भूगोल की ऐसी तस्वीर रखना है, जिसमें महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दर्शाया जा सके।

 

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