रात में फोन चलाने की आदत पड़ सकती है भारी, नींद से लेकर एकाग्रता तक पर असर के संकेत; रिसर्च में सामने आई अहम बातें

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नई दिल्ली: मोबाइल फोन आज रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह उठते ही फोन देखना हो या सोने से पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, स्क्रीन हमारी दिनचर्या में शामिल हो चुकी है। कई लोग काम के बीच बार-बार नोटिफिकेशन चेक करते हैं, जबकि कुछ लोग खाली समय मिलते ही रील्स, वीडियो और सोशल मीडिया पर समय बिताने लगते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय का नहीं, बल्कि इसका नींद, ध्यान और मानसिक कार्यक्षमता पर पड़ने वाले असर का भी है।

हालिया शोधों में मोबाइल और स्क्रीन टाइम को लेकर कई अहम संकेत मिले हैं। एक बड़े व्यवस्थित विश्लेषण में 21 अध्ययनों और करीब 5.48 लाख लोगों के आंकड़ों को शामिल किया गया। इसमें अधिक स्क्रीन टाइम का संबंध कम नींद, अनिद्रा के लक्षण, देर से सोने और नींद आने में परेशानी से पाया गया। विश्लेषण के मुताबिक, स्क्रीन टाइम में हर अतिरिक्त घंटे के साथ सोने का समय औसतन करीब 13 मिनट तक आगे खिसक सकता है।

रात में फोन इस्तेमाल से क्यों बिगड़ सकती है नींद?

रात में मोबाइल चलाने की समस्या केवल स्क्रीन की रोशनी तक सीमित नहीं है। लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और मैसेज दिमाग को सक्रिय बनाए रख सकते हैं। ऐसे में बिस्तर पर जाने के बाद भी व्यक्ति मानसिक रूप से आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता।

इसका असर सोने में लगने वाले समय और नींद की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। खासतौर पर अगर फोन देखने की आदत के कारण व्यक्ति देर रात तक जागता रहता है और उसकी कुल नींद का समय कम हो जाता है, तो अगले दिन इसका असर महसूस हो सकता है।

स्मार्टफोन और एकाग्रता के बीच भी सामने आया संबंध

2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सोने से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल के प्रभावों का अध्ययन किया गया। इसमें सोने से पहले लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले छात्रों में खराब नींद की संभावना अधिक पाई गई।

अध्ययन में मोबाइल के लंबे इस्तेमाल का संबंध एकाग्रता और कुछ प्रदर्शन संबंधी मापदंडों में कमी तथा प्रतिक्रिया समय बढ़ने से भी जोड़ा गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि इन निष्कर्षों को व्यापक आबादी पर लागू करने के लिए आगे बड़े अध्ययनों की जरूरत है।

क्या मोबाइल सीधे दिमाग को नुकसान पहुंचा रहा है?

यह कहना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा कि मोबाइल सीधे हमारे दिमाग को खराब कर रहा है। समस्या अक्सर फोन के इस्तेमाल से बनने वाली आदतों और उससे प्रभावित होने वाली नींद से जुड़ी होती है।

अगर कोई व्यक्ति रात में देर तक फोन चलाता है और इसके कारण पर्याप्त नींद नहीं ले पाता, तो अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान लगाने में परेशानी और काम करने की क्षमता में कमी महसूस हो सकती है। लंबे समय तक नींद खराब रहने पर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

सोने से पहले फोन इस्तेमाल और खराब नींद का संबंध

2026 में किए गए एक अन्य अध्ययन में वयस्कों के बीच सोशल मीडिया और सोने से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल के संबंध का अध्ययन किया गया। इसमें अधिक स्मार्टफोन निर्भरता और बिस्तर पर फोन इस्तेमाल करने का संबंध खराब नींद से पाया गया।

वहीं, खराब नींद और कुछ कार्यकारी क्षमताओं, जैसे वर्किंग मेमोरी और ध्यान नियंत्रित करने में आने वाली कठिनाइयों के बीच भी संबंध सामने आया। हालांकि, इस अध्ययन से भी यह पूरी तरह साबित नहीं होता कि स्मार्टफोन इस्तेमाल सीधे इन समस्याओं का कारण है।

फोन छोड़ना नहीं, इस्तेमाल का तरीका बदलना जरूरी

मोबाइल को पूरी तरह छोड़ना व्यावहारिक समाधान नहीं है। इसके बजाय इसके इस्तेमाल का तरीका बदलना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। खासतौर पर सोने से पहले फोन से दूरी बनाना एक आसान कदम है।

रात में स्क्रीन टाइम कम करना, गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद रखना और फोन को बिस्तर से दूर रखना मददगार आदतें हो सकती हैं। दिन में भी बिना जरूरत बार-बार फोन देखने की आदत को नियंत्रित किया जा सकता है।

मोबाइल हमारी जिंदगी को आसान बनाने वाली तकनीक है, लेकिन जब इसका इस्तेमाल नींद और रोजमर्रा की एकाग्रता पर असर डालने लगे तो सावधान होने की जरूरत है। मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाण यह नहीं कहते कि मोबाइल हमारे दिमाग को सीधे और स्थायी रूप से बदल रहा है। हालांकि, लगातार और खासकर रात में अत्यधिक इस्तेमाल नींद तथा उससे जुड़ी मानसिक कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए मुद्दा मोबाइल छोड़ने का नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल पर नियंत्रण रखने का है।

 

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