सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट का फैसला भारत ने ठुकराया, मोदी सरकार ने कहा- ‘संप्रभु फैसलों पर अधिकार नहीं’

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नई दिल्ली: भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने इस मध्यस्थता संस्था को ही गैर-कानूनी तरीके से गठित बताया है। भारत का कहना है कि इस संस्था के फैसले से उसके संप्रभु फैसलों या जम्मू-कश्मीर में चल रही परियोजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

भारत ने संधि को रोके रखने का फैसला दोहराया
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, सिंधु जल संधि को रोके रखने का भारत का फैसला अभी भी लागू है। मंत्रालय ने उस फैसले को स्वीकार करने से इनकार किया है, जिसमें संधि को प्रभावी बताते हुए भारत से जम्मू-कश्मीर में एक पनबिजली परियोजना पर काम सीमित करने को कहा गया था। भारत ने कहा कि तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के पास उसके संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।

हेग की अदालत ने भारत से क्या कहा?
हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सोमवार को कहा कि भारत को पाकिस्तान के साथ पानी के बंटवारे से संबंधित सिंधु जल संधि का पालन करना चाहिए। अदालत ने जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में बन रहे हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट पर भारत के काम को सीमित करने की बात भी कही। अदालत के अनुसार सिंधु जल संधि अभी पूरी तरह लागू है और भारत के पास इसे समाप्त करने या रोकने का उचित आधार नहीं था।

अदालत ने कहा कि भारत को संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना होगा। इसमें पश्चिमी नदियों पर पनबिजली परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से संबंधित दायित्व भी शामिल हैं। अदालत के मुताबिक विश्व बैंक की ओर से नियुक्त निष्पक्ष विशेषज्ञ जुलाई 2027 तक यह तय करेगा कि हिमालयी क्षेत्र में हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट का निर्माण संधि के अनुरूप है या नहीं।

रातले परियोजना को लेकर भी लगाई रोक
पाकिस्तान की मांग के आधार पर अदालत ने कहा कि निष्पक्ष विशेषज्ञ के फैसले के 90 दिन बाद तक भारत रातले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट में तय स्तर से ऊपर बांध की दीवार और पावर इनटेक स्ट्रक्चर का निर्माण नहीं कर सकेगा।

भारत ने मध्यस्थता अदालत को ही नहीं माना
भारत ने कहा है कि इस मध्यस्थता संस्था का गठन विश्व बैंक द्वारा सिंधु जल संधि की शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए किया गया था। विदेश मंत्रालय के अनुसार तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने संधि के तहत अंतरिम उपायों और स्थिति से संबंधित फैसला जारी किया है, लेकिन भारत इसे पूरी तरह खारिज करता है।

सरकार ने कहा कि भारत ने इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत को कभी कानूनी मान्यता नहीं दी। भारत का लगातार यह रुख रहा है कि इस संस्था का गठन ही सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है। इसी वजह से भारत इस संस्था के समक्ष कभी पेश नहीं हुआ और इसके पहले के फैसलों को भी स्वीकार नहीं किया।

भारत बोला- परियोजनाओं पर नहीं पड़ेगा असर
भारत ने स्पष्ट किया कि इस तथाकथित मध्यस्थता अदालत को भारत के संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का अधिकार नहीं है। सरकार के मुताबिक, इस संस्था के मौजूदा या भविष्य के फैसलों का भारत की ओर से संचालित परियोजनाओं से जुड़े कार्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

पहलगाम हमले के बाद संधि रोकी थी
भारत ने दोहराया कि सिंधु जल संधि को कुछ समय के लिए रोके रखने का उसका फैसला अभी भी प्रभावी है। पहलगाम हमले के बाद भारत ने पिछले साल अप्रैल में संधि को रोका था। यह संधि पाकिस्तान के करीब 80 प्रतिशत खेतों को पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

1960 में हुआ था भारत-पाकिस्तान के बीच समझौता
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे से जुड़ा महत्वपूर्ण समझौता है। 19 सितंबर 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता में इस पर हस्ताक्षर हुए थे। भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

 

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