काठमांडू: नेपाल में बुधवार को आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी। नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे रसुवा जिले में भोटेकोशी-ल्हेन्डे खोला तंत्र के पास अचानक आई बाढ़ ने घरों, सड़कों, पुलों और जरूरी बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। इस आपदा में अब तक करीब 300 लोगों की मौत की खबर है, जबकि सैकड़ों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। शुरुआती रिपोर्टों में बर्फ खिसकने की वजह भूकंप को माना गया था, लेकिन बाद में उपग्रह तस्वीरों और भूवैज्ञानिक जांच में टेक्टोनिक भूकंप के बजाय ग्लेशियर या बर्फ के गिरने और मलबे के तेजी से नीचे आने की बात सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर नेपाल में बार-बार इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदाएं क्यों आती हैं?
नेपाल की भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियां इसे कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती हैं। यहां भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों का लगातार टकराव, ऊंचे और अस्थिर पहाड़, तेजी से गर्म होता हिमालय, भारी मानसूनी बारिश, संकरी घाटियां और इन्हीं इलाकों में बना बुनियादी ढांचा खतरे को कई गुना बढ़ा देता है।
1. भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों का टकराव बढ़ाता है भूकंप का खतरा
नेपाल ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहां भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं। भारतीय प्लेट करीब 20 से 21 मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से यूरेशियाई प्लेट की तरफ बढ़ रही है। दोनों प्लेटों के बीच यह टकराव करीब 5 करोड़ साल पहले शुरू हुआ था और आज भी जारी है। इसके कारण हिमालय के नीचे पृथ्वी की ऊपरी परत में लगातार दबाव और बदलाव होते रहते हैं, जिससे नेपाल में भूकंप का खतरा काफी अधिक बना रहता है।
2. संकरी और खड़ी घाटियों से तेजी से बहता है पानी
नेपाल में दुनिया की कुछ सबसे ऊंची पर्वत चोटियां हैं और यहां की कई नदियां संकरी तथा बेहद खड़ी घाटियों से होकर गुजरती हैं। सामान्य स्थिति में यह भौगोलिक संरचना ज्यादा परेशानी नहीं पैदा करती, लेकिन अचानक भारी मात्रा में पानी आने पर हालात तेजी से बिगड़ जाते हैं। संकरी घाटियों में पानी के फैलने की जगह कम होती है और गुरुत्वाकर्षण के कारण वह तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहता है। इससे अचानक बाढ़ का असर बेहद विनाशकारी हो सकता है।
3. तेजी से गर्म हो रहा हिंदू कुश हिमालय
हिंदू कुश हिमालय के तेजी से गर्म होने से ग्लेशियरों पर भी असर पड़ रहा है। ग्लेशियरों का द्रव्यमान घट रहा है और वे पीछे की ओर खिसक रहे हैं। 2026 के ताजा आकलन के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद से हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो गई है। ग्लेशियरों की निगरानी भी पर्याप्त नहीं है और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लंबे समय तक निगरानी केवल कुछ ही ग्लेशियरों पर हो रही है।
4. ग्लेशियल झीलें भी बन सकती हैं बड़े खतरे की वजह
ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलें भी नेपाल और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों के लिए जोखिम पैदा करती हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2020 की सूची के मुताबिक कोशी, गंडकी और करनाली बेसिन में 3,624 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई थीं। इनमें 47 को संभावित रूप से खतरनाक माना गया था। इनमें 25 तिब्बत, 21 नेपाल और एक भारत में स्थित थी। हालांकि केवल झीलों की संख्या जान लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि समय के साथ इनके आकार और खतरे का स्तर भी बदल सकता है।
5. ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों के गिरने से अचानक बढ़ता खतरा
हालिया बाढ़ को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप के कारण भूस्खलन की आशंका जताई गई थी। बाद में सामने आए विश्लेषण में इसकी वजह ग्लेशियर के गिरने को बताया गया। इस अंतर को समझना जरूरी है, लेकिन इससे पहाड़ी क्षेत्रों का व्यापक खतरा कम नहीं होता। गर्म और अस्थिर पहाड़ों से बर्फ और चट्टानें टूटकर नीचे आ सकती हैं। खड़ी ढलान मलबे को तेजी देती है और नदियां उसके बहाव का रास्ता बन जाती हैं। इसका सीधा असर नीचे बसे इलाकों पर पड़ता है।
6. मानसून की भारी बारिश बढ़ाती है बाढ़ और भूस्खलन का खतरा
नेपाल दक्षिण एशियाई मानसून के प्रभाव वाले क्षेत्र में आता है। भारी बारिश होने पर पहाड़ों की ढलानों में पानी भर जाता है। इससे मिट्टी और चट्टानों के खिसकने, भूस्खलन, नदियों का रास्ता बाधित होने और अचानक बाढ़ आने की आशंका बढ़ जाती है। नेपाल की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां जलवायु से जुड़े इन खतरों को और गंभीर बना देती हैं।
7. पहाड़ों की भूगर्भीय बनावट पहले से ही अस्थिर
हिमालय अपेक्षाकृत नए, ऊंचे और भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत हैं। इसलिए यहां की कई ढलानें स्वाभाविक रूप से अस्थिर रहती हैं। जब इसके साथ भारी बारिश, भूकंप, सड़क निर्माण, जंगलों की कटाई, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, मिट्टी का कटाव और ग्लेशियरों का पीछे हटना जुड़ता है तो ढलानों के खिसकने का खतरा और बढ़ जाता है।
8. जहां बाढ़ का रास्ता, वहीं सड़कें और बस्तियां
नेपाल में निर्माण के लिए समतल जमीन सीमित है। इसी वजह से कई बस्तियां, सड़कें, पुल, पनबिजली परियोजनाएं और दूसरे बुनियादी ढांचे घाटियों तथा नदियों के आसपास विकसित हुए हैं। समस्या यह है कि यही इलाके बाढ़ के पानी और भूस्खलन के प्राकृतिक रास्ते भी होते हैं। ऐसे में प्राकृतिक आपदा आने पर इंसानी बस्तियों और बुनियादी ढांचे के सीधे प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।
9. आपदा के बाद राहत और बचाव भी बन जाता है बड़ी चुनौती
नेपाल की भौगोलिक परिस्थितियां सिर्फ आपदा का असर नहीं बढ़ातीं, बल्कि राहत और बचाव अभियान को भी मुश्किल बना देती हैं। भूस्खलन के कारण किसी बस्ती तक पहुंचने वाली एकमात्र सड़क बंद हो सकती है। पुल टूटने पर पूरी घाटी का संपर्क कट सकता है। वहीं भारी मलबे के कारण बचाव दलों के लिए प्रभावित इलाकों तक वाहन पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। इस तरह जिस भौगोलिक बनावट से आपदा ज्यादा गंभीर होती है, वही राहत कार्य की रफ्तार भी कम कर देती है।
10. नेपाल में एक नहीं, कई तरह के खतरे एक साथ मौजूद
नेपाल को केवल प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित देश मानना पूरी तस्वीर नहीं बताता। खराब निर्माण तकनीक और बुनियादी ढांचे के कमजोर मानकों के कारण इमारतें भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती हैं। तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी जोखिम बढ़ा सकता है। यानी नेपाल की समस्या सिर्फ किसी एक प्राकृतिक आपदा से नहीं है। यहां भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियरों से जुड़े खतरे और कमजोर बुनियादी ढांचा एक-दूसरे के असर को बढ़ा देते हैं।