23 मुस्लिम बहुल सीटें तय करेंगी कांग्रेस की वापसी, बीजेपी के साथ AIUDF से सीधा मुकाबला

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असम की सियासत में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प होता जा रहा है। करीब एक दशक बाद सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही Indian National Congress के लिए मुस्लिम बहुल 23 विधानसभा सीटें निर्णायक साबित हो सकती हैं। परिसीमन के बाद इन सीटों की संख्या घटकर 23 रह गई है और यहीं से सत्ता की राह तय होने वाली है।

परिसीमन के बाद बदला समीकरण
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और All India United Democratic Front के गठबंधन ने 31 मुस्लिम बहुल सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन नए परिसीमन के बाद इन सीटों की संख्या घटकर 23 हो गई है। इस बार दोनों दल अलग-अलग मैदान में हैं, जिससे इन सीटों पर सीधा मुकाबला देखने को मिलेगा। इन सीटों पर थोड़ी भी चूक कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है।

मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस की पकड़ मजबूत
राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ सीधी चुनौती देने के कारण कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत विकल्प के रूप में उभरी है। हाल के लोकसभा चुनाव में इसका असर भी दिखा, जहां ढुबरी सीट पर कांग्रेस के Rakibul Hussain को करीब 15 लाख वोट मिले, जबकि AIUDF प्रमुख Badruddin Ajmal पांच लाख वोटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके।

पिछले चुनावों का प्रदर्शन और बदलती रणनीति
हालांकि, पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को असम की 14 में से सिर्फ 3 सीटों पर ही जीत मिली थी और AIUDF का खाता भी नहीं खुल पाया था। इससे पहले मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIUDF का दबदबा रहा है—2016 में 13 और 2011 में 18 सीटों पर जीत इसका उदाहरण है। इस बार बदरुद्दीन अजमल अपनी पकड़ दोबारा मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

ओवैसी की एंट्री से बदलेगा खेल?
बिहार के सीमांचल में असर दिखाने वाले Asaduddin Owaisi को AIUDF ने असम के चुनावी मैदान में उतारा है। अब देखना होगा कि ओवैसी का प्रभाव असम के मुस्लिम वोटरों पर कितना पड़ता है। फिलहाल AIUDF का पूरा फोकस कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने पर है, न कि सत्ताधारी भाजपा पर।

बीजेपी की रणनीति और कांग्रेस की चुनौती
राज्य के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma लगातार कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसे एक खास वर्ग की पार्टी बताकर हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस इस पर सीधा जवाब देने से बचते हुए मुस्लिम वोटों के साथ-साथ भाजपा विरोधी मतों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही है।

 

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