हिंदू नववर्ष 2083 13 महीने का होगा, जानें धार्मिक कारण

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नई दिल्ली : जहां अंग्रेजी कैलेंडर में नया साल जनवरी से शुरू होता है, वहीं हिंदू पंचांग (Hindu calendar) के अनुसार समय की गणना विक्रम संवत से होती है. हिंदू नववर्ष की शुरुआत चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मानी जाती है. आने वाला विक्रम संवत 2083 खास माना जा रहा है, क्योंकि इस साल अधिक मास लगेगा. इसकी वजह से यह साल 12 नहीं, बल्कि 13 महीनों का होगा, जो काफी दुर्लभ माना जाता है.

विक्रम संवत 2083 कब से शुरू होगा?
विक्रम संवत 2083 की शुरुआत 19 मार्च 2026 से होगी. इसी दिन गुड़ी पड़वा मनाया जाएगा और चैत्र (वसंत) नवरात्र भी शुरू होंगी.

इस साल ज्येष्ठ मास में अधिक मास लगेगा. अधिक ज्येष्ठ मास की शुरुआत 17 मई 2026 से होगी और यह 15 जून 2026 तक रहेगा. इस वजह से कई व्रत और त्योहार लगभग 15 से 20 दिन आगे खिसक सकते हैं. अधिकमास के कारण यह हिंदू नववर्ष 13 महीनों का होगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस अतिरिक्त महीने को अपना नाम दिया, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. इसे सभी महीनों से अधिक पवित्र माना जाता है. अधिकमास को मलमास, अधिक मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. मान्यता है कि यह समय भक्ति, साधना और आत्मिक उन्नति के लिए सबसे शुभ होता है.

हिंदू कथाओं के अनुसार, जब अधिकमास पहली बार आया, तो कोई भी देवता इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था. तब भगवान विष्णु ने इसे अपने संरक्षण में लेकर पुरुषोत्तम मास नाम दिया. तभी से यह महीना बेहद पवित्र माना जाता है. माना जाता है कि इस दौरान की गई पूजा, जप, तप और दान से सुख, शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है. पंचांग के अनुसार, 17 मई से 15 जून 2026 तक का पूरा समय साधना, मंत्र जाप, ध्यान और दान के लिए अत्यंत शुभ माना जाएगा. इस महीने के पहले दिन व्रत रखने से पाप नष्ट होने और सकारात्मक ऊर्जा मिलने की मान्यता है.

विक्रम संवत 2083 में एक खास बात यह भी होगी कि दो ज्येष्ठ मास पड़ेंगे. एक होगा सामान्य ज्येष्ठ मास और दूसरा होगा अधिक ज्येष्ठ (पुरुषोत्तम) मास. अधिकमास के कारण ज्येष्ठ महीना लगभग 58–59 दिनों तक चलेगा और दोनों महीने कुछ समय के लिए आपस में मिलेंगे.

इस बार अधिक ज्येष्ठ मास की शुरुआत 17 मई 2026 से होगी और समापन 15 जून 2026 को होगा. वहीं, सामान्य ज्येष्ठ मास की शुरुआत 22 मई 2026 से होगी और समापन 29 जून 2026 को होगी. इसी वजह से यह साल पंचांग और खगोलीय दृष्टि से बहुत खास माना जा रहा है.

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अधिकमास के दौरान शादी, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, भूमि पूजन या नया कारोबार शुरू करना शुभ नहीं माना जाता. मान्यता है कि इस समय ग्रहों की स्थिति अनुकूल नहीं होती, इसलिए ऐसे कामों से मनचाहा फल नहीं मिलता. इसी कारण बड़े शुभ संस्कारों को इस पूरे महीने टालने की परंपरा है.

दरअसल, सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष की अवधि में अंतर होता है. सूर्य वर्ष 365 दिन का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354-355 दिन का होता है. यह अंतर समय के साथ बढ़ता जाता है और करीब 32 महीने 16 दिन में इसे संतुलित करना जरूरी हो जाता है. इसी संतुलन के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है.

हिंदू त्योहार और व्रत चंद्र तिथियों पर आधारित होते हैं. अगर अधिकमास न जोड़ा जाए, तो त्योहार अपने मौसम से हट जाएंगे, जैसे दिवाली बरसात में और होली सर्दियों में आने लगेगी. इसी गड़बड़ी को रोकने के लिए प्राचीन विद्वानों ने अधिकमास की व्यवस्था बनाई. यह न सिर्फ गणितीय रूप से जरूरी है, बल्कि धार्मिक रूप से भी इसे अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना जाता है.

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