US-EU टकराव में भारत की होगी चांदी, सेफ ट्रेड पार्टनर बनकर ऐसे उठाएगा फायदा

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नई दिल्ली : अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बढ़ते ट्रेड टकराव ने वैश्विक व्यापार समीकरणों में हलचल तेज़ कर दी है. ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बाद EU ने अमेरिका के साथ हुए ट्रेड डील की मंजूरी प्रक्रिया रोक दी है. इसी घटनाक्रम के बीच भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर गतिविधियाँ तेज़ हो गई हैं, जिससे भारत एक भरोसेमंद और स्थिर ट्रेड पार्टनर के रूप में उभरता दिख रहा है.

अमेरिका की ओर से संकेत दिया गया कि जो यूरोपीय देश ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुख का विरोध करेंगे, उन पर 10 से 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है. EU ने इसे सीधे तौर पर समझौते की शर्तों का उल्लंघन बताया. EU का कहना है कि जुलाई में हुए ट्रेड समझौते के तहत अधिकांश यूरोपीय उत्पादों पर टैरिफ की अधिकतम सीमा 15 प्रतिशत तय है, ऐसे में राजनीतिक दबाव बनाकर टैरिफ की धमकी देना स्वीकार्य नहीं है.

यूरोपीय संसद की ट्रेड कमेटी ने साफ कर दिया है कि जब तक टैरिफ की धमकी पूरी तरह वापस नहीं ली जाती, तब तक अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर आगे बढ़ना संभव नहीं है.यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष Ursula von der Leyen का बयान इस पूरे विवाद का सार है. उन्होंने कहा कि डील एक डील होती है. जब दोस्त हाथ मिलाते हैं, तो उसका मतलब होना चाहिए. EU नेताओं का आरोप है कि टैरिफ को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना यूरोप की आर्थिक और क्षेत्रीय संप्रभुता पर हमला है.

US-EU रिश्तों में आई यह तल्खी ऐसे समय सामने आई है जब भारत और EU के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर बातचीत निर्णायक चरण में है. EU के शीर्ष नेतृत्व का जनवरी के अंत में भारत दौरा इसी पृष्ठभूमि में बेहद अहम माना जा रहा है. यह केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेश, सप्लाई चेन, सुरक्षा साझेदारी और वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी एक साझा रोडमैप तय करेगा. विशेषज्ञों के मुताबिक EU अब ऐसे साझेदार की तलाश में है जो टैरिफ की धमकी न दे, संप्रभुता के मुद्दों को ट्रेड से न जोड़े और नियम आधारित और दीर्घकालिक साझेदारी पर भरोसा करे. इस कसौटी पर भारत EU के लिए नेचुरल चॉइस बनकर उभरता है.

भारत और EU के बीच प्रस्तावित FTA केवल व्यापार समझौता नहीं, बल्कि एक जियो-इकोनॉमिक पार्टनरशिप है. इससे EU को एशिया में एक स्थिर, लोकतांत्रिक और बड़ा बाजार मिलेगा. भारत को यूरोपीय बाज़ार में IT, फार्मा, टेक्सटाइल, ऑटो और सर्विस सेक्टर में बेहतर एक्सेस मिल सकता है. दोनों पक्ष चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति को मजबूती देंगे.

 

 

 

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