थाईलैंड मास्टर्स सुपर 300 की चैंपियन देविका सिहाग कौन हैं? लंबी कद-काठी, तेज़ अटैक और नए आत्मविश्वास के साथ उभरी भारतीय स्टार

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हरियाणा के पंचकूला की रहने वाली देविका सिहाग के लिए बैडमिंटन की शुरुआत कभी किसी बड़े सपने का हिस्सा नहीं थी। जब उनके पिता ने उन्हें और उनके छोटे भाई को ताऊ देवीलाल स्टेडियम में दाख़िल कराया, तब देविका को लगा कि सब कुछ बहुत जल्दी हो रहा है। पढ़ाई का दबाव था और खेल में शुरुआती दिलचस्पी भी कम थी। लेकिन जैसे-जैसे स्टेट लेवल पर नतीजे आने लगे, बैडमिंटन धीरे-धीरे उनकी पहचान बनता चला गया।

थाईलैंड मास्टर्स सुपर 300 का खिताब जीतने के बाद देविका ने माना कि स्पीड और तेज़ खेल उन्हें सबसे ज़्यादा आकर्षित करता है। 20 साल की इस खिलाड़ी ने फाइनल में मलेशिया की गोह जिन वेई को हराया, जो 21-8, 6-3 से पीछे रहने के बाद हैमस्ट्रिंग पकड़कर रिटायर हो गईं। इस जीत के साथ देविका, पीवी सिंधु के बाद सुपर 300 खिताब जीतने वाली भारतीय महिला सिंगल्स खिलाड़ियों की सूची में शामिल हो गईं।

पंचकूला से इंटरनेशनल पोडियम तक का सफर

देविका के पिता पेशे से वकील हैं और फिटनेस के शौकीन रहे हैं। वह ताऊ देवीलाल स्टेडियम में दौड़ लगाने जाते थे और चाहते थे कि उनके बच्चे भी खेलों से जुड़ें। एक साल देविका को स्वर्गीय कृष्णा खेतान फाइनल में तारा शाह से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कोचों को उनमें हमेशा खास पोटेंशियल दिखता रहा।

जैसे-जैसे उनकी हाइट बढ़ी और वह 172 सेंटीमीटर (करीब 5 फुट 9 इंच) तक पहुंचीं, उनकी मां—जो एक शिक्षिका हैं—ने पिता को बेंगलुरु भेजने के लिए मनाया। देविका मानती हैं कि शुरुआत में घर से दूर जाना आसान नहीं था, लेकिन छह साल में उन्होंने खुद को इस जीवन के लिए ढाल लिया।

बेंगलुरु में बदली किस्मत

देविका फिलहाल विमल कुमार के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में ट्रेनिंग कर रही हैं। वहां इंडोनेशियाई कोच इरवांस्याह के साथ काम करने का उन्हें खास फायदा मिला, जो पहले पीवी सिंधु को भी ट्रेन कर चुके हैं। सिंधु की फिटनेस और अटैकिंग गेम देविका के लिए बड़ी प्रेरणा रही है।

हालांकि पिछले साल देविका का सफर आसान नहीं रहा। वह कई बार अपनी ही भारतीय साथियों से तीन गेम के मुकाबले हार गईं, जिससे उनका आत्मविश्वास डगमगा गया था।

कंसिस्टेंसी और सब्र बना जीत की कुंजी

कोच सायाली गोखले के मुताबिक, थाईलैंड मास्टर्स के पूरे हफ्ते देविका बेहद कंसिस्टेंट और धैर्यवान रहीं। उनका नैचुरल गेम हमेशा से आक्रामक रहा है, लेकिन सही मौकों पर उस अटैक का इस्तेमाल करना सीखना जरूरी था।

थाईलैंड में देविका ने वर्ल्ड नंबर 16 सहित दो ऊंची रैंकिंग वाली खिलाड़ियों को हराया। उन्होंने न सिर्फ अपने ताकतवर स्मैश का प्रदर्शन किया, बल्कि समझदारी से ड्रॉप्स और क्लियर्स का इस्तेमाल भी किया। उनकी हाइट की वजह से शॉट्स में गहराई थी, जिसने टॉप खिलाड़ियों को लगातार दबाव में रखा।

फाइनल में रणनीति की जीत

गोह जिन वेई, जो पहले टॉप-20 में रह चुकी हैं लेकिन चोट से जूझ रही थीं, मूवमेंट में संघर्ष कर रही थीं। देविका ने इस कमजोरी को भांपते हुए सही समय पर बड़े अटैक किए और जरूरत पड़ने पर नेट पर स्ट्रोक्स बदलकर रैलियों में टिके रहने का फैसला लिया।

खासतौर पर मुश्किल पलों में रिट्रीव करने की उनकी क्षमता ने ध्यान खींचा—एक ऐसी खूबी जो आमतौर पर अटैक-हैवी खिलाड़ियों में कम देखने को मिलती है। देविका ने मैच के बाद कहा कि उन्होंने जीत-हार की चिंता छोड़कर सिर्फ अपना 100 प्रतिशत देने का फैसला किया, जिससे दबाव कम हुआ और खेल खुलकर निकला।

घर की याद और प्रोफेशनल डिसिप्लिन

बेंगलुरु आने के शुरुआती महीनों में देविका को घर की बहुत याद आती थी। लेकिन कोच उमेंद्र राणा और सागर चोपड़ा ने उन्हें बड़े ट्रेनिंग सेंटर के फायदे समझाए और सेटल होने में मदद की। देविका आज भी घर के बने राजमा-चावल को मिस करती हैं, लेकिन मानती हैं कि बेंगलुरु में मिली ट्रेनिंग ने उनकी स्पीड और स्किल्स को नया आयाम दिया।

अभी और मेहनत बाकी

कोच सायाली गोखले का मानना है कि विमेंस सिंगल्स अब बेहद कंसिस्टेंट और तेज़ हो चुका है। देविका तकनीकी रूप से मजबूत हैं, लेकिन स्ट्रेंथ और कोर्ट स्पीड पर अभी और काम की जरूरत है। इंजरी-फ्री रहना भी उनके करियर के लिए अहम होगा।

सायाली इस बात से खास तौर पर प्रभावित रहीं कि देविका का वॉर्म-अप, रिकवरी और डाइट को लेकर डिसिप्लिन कितना प्रोफेशनल था। बेंगलुरु में 10 लोगों की एक सपोर्ट टीम उनके साथ काम कर रही है।

लंबी कद-काठी, बड़ा अटैक और नया आत्मविश्वास

लगातार घुटने की परेशानी के बावजूद देविका ने इस सीजन में अपने अटैकिंग गेम को और निखारा है। उन्होंने फाइनल में फ्रंट कोर्ट ड्रॉप्स, स्ट्रेट सर्व और स्ट्रेट स्मैश का शानदार इस्तेमाल किया। ये शॉट्स न सिर्फ गोह के खिलाफ असरदार रहे, बल्कि तेज मूवमेंट वाली खिलाड़ियों के खिलाफ भी कारगर साबित हो सकते हैं।

सागर चोपड़ा के मुताबिक, इस टूर्नामेंट में देविका का शांत रवैया और स्थिर आक्रामकता उनके लंबे समय से चले आ रहे ग्रोथ का नतीजा है। इससे पहले वह वर्ल्ड नंबर 16 सुपनिडा कटेथोंग और सेमीफाइनल में पांचवीं सीड हुआंग यू-सुन को हराकर भी चर्चा में आई थीं।

रविवार को, शांत सलाह और आत्मविश्वास के साथ देविका सिहाग ने आखिरकार अपना पहला सुपर 300 खिताब जीत लिया। अब उनसे उम्मीद है कि वह इस जीत को भारतीय महिला बैडमिंटन के लिए एक नई शुरुआत में बदलेंगी।

 

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