होली पर संभल का गुलाल रचेगा देश-विदेश में रंग, अयोध्या से नेपाल तक पहली बार पहुंचेगा ‘चॉकलेट फ्लेवर’

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संभल। रंगों के त्योहार होली को लेकर इस बार संभल के गुलाल की खुशबू और रंगों का दायरा सिर्फ अयोध्या, काशी और मथुरा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पहली बार विदेश में भी इसकी रंगत बिखरेगी। चार मार्च को होने वाली होली के लिए यहां बड़े पैमाने पर हर्बल गुलाल का उत्पादन किया जा रहा है, जिसकी मांग देश के कई राज्यों के साथ-साथ नेपाल से भी आई है।

तीन महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारी
अपनी सुगंध और गुणवत्ता के लिए मशहूर संभल का गुलाल हर साल होली से तीन-चार महीने पहले तैयार होना शुरू हो जाता है। चंदन, गुलाब और जैसमीन की प्राकृतिक खुशबू से बना यह हर्बल गुलाल न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि अन्य राज्यों में भी खास पहचान रखता है।

अयोध्या में पहली बार सप्लाई, नेपाल से 10 टन का ऑर्डर
इस बार संभल का भगवा गुलाल मथुरा और काशी के साथ-साथ अयोध्या में भी धार्मिक आयोजनों और मंदिरों के लिए भेजा जा रहा है। खास बात यह है कि पहली बार नेपाल से 10 टन गुलाल का ऑर्डर मिला है, जिससे स्थानीय उद्योग में उत्साह का माहौल है।

चॉकलेट और नारियल फ्लेवर ने बढ़ाई खासियत
इस सीजन में पहली बार चॉकलेट और कोकोनट फ्लेवर में भी गुलाल तैयार किया जा रहा है। इसके अलावा फलों की खुशबू वाले रंग भी बाजार में उतारे जा रहे हैं, जिनकी मांग लगातार बढ़ रही है। हर्बल गुलाल में इस्तेमाल होने वाली खुशबू कन्नौज और अहमदाबाद से मंगाई जाती है, ताकि गुणवत्ता में कोई समझौता न हो।

300 टन उत्पादन, 12 राज्यों तक सप्लाई
इस साल संभल में करीब 300 टन हर्बल गुलाल का उत्पादन किया जा रहा है। यह गुलाल उत्तर प्रदेश के अलावा झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तराखंड, असम, तमिलनाडु और बिहार समेत कुल 12 राज्यों में भेजा जा रहा है। इनमें सबसे ज्यादा मांग भगवा गुलाल की बताई जा रही है।

परंपरा और तकनीक का अनोखा मेल
गुलाल बनाने की प्रक्रिया में पारंपरिक अनुभव और वैज्ञानिक तकनीक का संयोजन देखने को मिलता है। आधार सामग्री के रूप में मक्का के आटे का इस्तेमाल होता है। इसके बाद प्राकृतिक फूलों के रंग मशीनों के जरिए मिलाए जाते हैं। मिश्रण को चार दिन तक धूप में सुखाया जाता है, फिर दोबारा बारीक पिसाई कर अंतिम चरण में विशेष खुशबू मिलाई जाती है।

1990 से शुरू हुआ सफर, आज बनी पहचान
फर्म स्वामी हर्ष गुप्ता बताते हैं कि अब काशी और मथुरा के साथ अयोध्या में भी संभल का गुलाल धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बन रहा है। निर्माता बृजेश गुप्ता ने वर्ष 1990 में रंग बनाने की शुरुआत की थी। पहले वे अपने पिता के साथ काम करते थे, फिर घर पर ही गुलाल बनाना सीखा और धीरे-धीरे स्थानीय बाजार से बाहर भी सप्लाई शुरू की।

रोजगार का मजबूत आधार बना गुलाल उद्योग
संभल का हर्बल गुलाल उद्योग होली के मौसम में स्थानीय रोजगार का बड़ा जरिया बन गया है। कच्चे माल की छनाई, रंग मिश्रण, धूप में सुखाने, पिसाई और पैकिंग तक की प्रक्रिया में दर्जनों श्रमिक जुटते हैं। करीब 70 परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर इससे जुड़ी है, जबकि सीजन के दौरान यह संख्या बढ़कर लगभग 80 परिवारों तक पहुंच जाती है। पैकिंग का काम बड़ी संख्या में महिलाएं संभालती हैं।

 

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