‘महाभारत’ की उत्तरा से बनीं स्टार: बिना ऑडिशन मिली थी भूमिका, शकुनी मामा ने बदली किस्मत, आज भी बरकरार है वर्षा उसगांवकर की चमक

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भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम दौर की बात हो और ‘महाभारत’ का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं। इस ऐतिहासिक धारावाहिक ने जहां कई कलाकारों को पहचान दी, वहीं ‘उत्तरा’ का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री वर्षा उसगांवकर भी घर-घर में लोकप्रिय हो गईं। दिलचस्प बात यह है कि उनका यह सफर किसी योजना के तहत नहीं, बल्कि एक संयोग के चलते शुरू हुआ, जिसने उनकी किस्मत ही बदल दी।

संयोग से मिला ‘महाभारत’ में बड़ा मौका
वर्षा उसगांवकर को ‘महाभारत’ में ‘उत्तरा’ का रोल बिना किसी ऑडिशन के मिला था। बताया जाता है कि उनके पिता चाहते थे कि वह इस शो का हिस्सा बनें, लेकिन असल मोड़ तब आया जब वह एक दिन परिवार के साथ सेट पर शूटिंग देखने पहुंचीं। उस वक्त निर्माता ‘उत्तरा’ के किरदार के लिए चेहरे की तलाश कर रहे थे। सेट पर मौजूद गुफी पेंटल, जो ‘शकुनी मामा’ के किरदार के लिए मशहूर थे, की नजर वर्षा पर पड़ी और उन्होंने तुरंत उन्हें इस भूमिका के लिए सुझाव दिया। इसके बाद माता-पिता की सहमति से उन्हें बिना स्क्रीन टेस्ट के ही इस प्रतिष्ठित धारावाहिक में कास्ट कर लिया गया।

नृत्य से मिली पहचान, फिल्मों के खुले दरवाजे
धारावाहिक में वर्षा की एंट्री एक नृत्यांगना के रूप में हुई थी। उनके कथक आधारित डांस सीक्वेंस को मशहूर कोरियोग्राफर गोपी कृष्णा ने निर्देशित किया था। इस एक दृश्य ने उन्हें रातों-रात पहचान दिला दी। हालांकि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मराठी रंगमंच से की थी और फिल्म ‘गम्मत जम्मत’ से फिल्मों में कदम रखा, लेकिन ‘महाभारत’ की सफलता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

इसके बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। वर्ष 1990 में फिल्म ‘दूध का कर्ज’ से उन्होंने बॉलीवुड में एंट्री की और ‘तिरंगा’, ‘हनीमून’, ‘घर आया मेरा परदेसी’ और ‘इंसानियत के देवता’ जैसी फिल्मों में काम कर अपनी अलग पहचान बनाई। मराठी सिनेमा में भी ‘गम्मत जम्मत’, ‘लपंडाव’ और ‘भुताचा भाऊ’ जैसी फिल्मों से उन्होंने दर्शकों का दिल जीता।

मराठी और हिंदी सिनेमा पर क्या बोलीं अभिनेत्री
अपने अनुभवों को साझा करते हुए वर्षा उसगांवकर ने बताया कि मराठी और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कार्यशैली में काफी अंतर है। उनके मुताबिक मराठी सिनेमा में कहानी और किरदारों की गहराई को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि हिंदी फिल्मों में ग्लैमर और प्रस्तुति पर अधिक ध्यान दिया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी सिनेमा में राष्ट्रीय स्तर पर आकर्षण का केंद्र बनना जरूरी होता है, जबकि मराठी सिनेमा अपनी सादगी और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है।

आज भी एक्टिंग और कला जगत में सक्रिय
वर्षा उसगांवकर सिर्फ एक सफल अभिनेत्री ही नहीं, बल्कि एक कुशल गायिका भी हैं। समय के साथ उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। वह आज भी मराठी, हिंदी और कोंकणी मनोरंजन जगत में सक्रिय हैं और सोशल मीडिया के जरिए अपने प्रशंसकों से जुड़ी रहती हैं। टेलीविजन पर भी उनकी मौजूदगी लगातार बनी हुई है।

उन्हें ‘झांसी की रानी’ और ‘अलविदा डार्लिंग’ जैसे शोज में भी देखा गया। हाल के वर्षों में वह मराठी टीवी इंडस्ट्री में काफी सक्रिय रही हैं और उन्हें आखिरी बार स्टार प्रवाह के चर्चित धारावाहिक ‘सुख म्हणजे नक्की काय असतं!’ में ‘माई’ के अहम किरदार में देखा गया था।

 

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