पश्चिम बंगाल में नहीं चला ओवैसी का जादू, मुस्लिम बहुल सीटों पर भी AIMIM का सूपड़ा साफ; ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन को बड़ा झटका लगा है। बिहार चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद पार्टी को बंगाल से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन नतीजों और रुझानों ने AIMIM की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल सकी।
चुनाव से पहले ही पार्टी को उस वक्त बड़ा राजनीतिक झटका लगा था, जब हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ उसका गठबंधन टूट गया। इसके बाद ओवैसी ने पश्चिम बंगाल में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। हालांकि यह दांव सफल होता नजर नहीं आया।
मुस्लिम बहुल सीटों पर भी नहीं मिला समर्थन
AIMIM ने मालदा की मोथाबारी और सुजापुर, मुर्शिदाबाद की सूती, रघुनाथगंज और कांडी, बीरभूम की नलहाटी और मुरारई, उत्तर 24 परगना की हाबरा, बारासात और बशीरहाट दक्षिण, पश्चिम बर्धमान की आसनसोल उत्तरी और उत्तर दिनाजपुर की करनदिघी सीट पर उम्मीदवार उतारे थे।
चुनाव आयोग के दोपहर दो बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक, कई सीटों पर पार्टी बेहद कमजोर स्थिति में नजर आई। मोथाबारी सीट पर AIMIM उम्मीदवार को केवल 995 वोट मिले। सुजापुर में पार्टी को करीब 2500 वोट मिले, जबकि सूती में 741 और रघुनाथगंज में करीब 1400 वोट हासिल हुए।
हालांकि कांडी सीट पर पार्टी कुछ हद तक मुकाबले में दिखाई दी, जहां AIMIM उम्मीदवार 11 हजार से ज्यादा वोटों के साथ दूसरे स्थान पर बना हुआ है। इसके बावजूद राज्यभर में पार्टी का कुल वोट प्रतिशत महज 0.19 प्रतिशत दर्ज किया गया।
सीमांचल मॉडल बंगाल में नहीं आया काम
AIMIM के स्थानीय नेताओं को उम्मीद थी कि बिहार के सीमांचल इलाके में पार्टी के प्रभाव का असर पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में भी दिखाई देगा। खासकर मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में पार्टी ने इसी रणनीति के तहत जोर लगाया था।
पार्टी का मानना था कि बिहार में मिली राजनीतिक जमीन का फायदा बंगाल में भी मिल सकता है, लेकिन चुनावी रुझानों ने इस उम्मीद को झटका दे दिया। अधिकांश सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने की स्थिति बन गई।
मतदाता सूची विवाद को बनाया था बड़ा मुद्दा
चुनाव प्रचार के दौरान AIMIM ने मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। पार्टी ने आरोप लगाया था कि मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए।
इसके साथ ही ओवैसी पर एक बार फिर विपक्षी दलों की ओर से एंटी-बीजेपी वोटों को बांटने के आरोप लगे। हालांकि AIMIM लगातार यह कहती रही कि उसका मकसद अल्पसंख्यकों को स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व और प्रतिनिधित्व देना है।
गठबंधन टूटना पड़ा भारी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ गठबंधन टूटना AIMIM के लिए बड़ा नुकसान साबित हुआ। गठबंधन खत्म होने के बाद ओवैसी ने इन 12 सीटों पर पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन पार्टी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका।
पश्चिम बंगाल चुनाव के रुझानों ने साफ संकेत दिया है कि बिहार में मिली सफलता को AIMIM बंगाल में दोहराने में पूरी तरह नाकाम रही।