शादी का वादा टूटना ही रेप नहीं! हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, आरोपी के खिलाफ चार्जशीट से लेकर पूरी कार्यवाही रद्द

0 17

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल शादी का वादा पूरा न होना अपने आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह साबित होना आवश्यक है कि शुरुआत से ही शादी का वादा धोखा देने की नीयत से किया गया था और उसी आधार पर सहमति हासिल की गई थी। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज चार्जशीट, समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने यह आदेश संजय सरोज की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद माना कि मामला दो वयस्क व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक चले सहमति आधारित संबंध का प्रतीत होता है, जो बाद में विवाद में बदल गया।

2019 में दर्ज हुई थी एफआईआर

मामले के अनुसार, वर्ष 2019 में प्रयागराज के कर्नलगंज थाने में आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, मारपीट, गाली-गलौज और धमकी देने सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया था। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि आरोपी ने वर्ष 2014 से शादी का आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों पक्ष करीब पांच वर्षों तक लगातार संपर्क में रहे और उनके बीच संबंध भी बने रहे। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि एफआईआर में कथित घटनाओं के समय, स्थान और परिस्थितियों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था।

लंबे समय तक शिकायत न करना भी बना अहम आधार

हाईकोर्ट ने कहा कि महिला ने लंबे समय तक किसी प्रकार की शिकायत दर्ज नहीं कराई। उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह मामला किसी प्रेम संबंध के टूटने से उपजे विवाद जैसा अधिक प्रतीत होता है, न कि प्रथम दृष्टया दुष्कर्म का मामला।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल यह तथ्य कि बाद में विवाह नहीं हो सका या वादा पूरा नहीं हुआ, स्वतः दुष्कर्म का अपराध स्थापित नहीं करता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला

कोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में यह सिद्ध होना जरूरी है कि आरोपी ने शुरुआत से ही धोखाधड़ी की मंशा से विवाह का झूठा वादा किया था। यदि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने हों और बाद में परिस्थितियां बदल जाएं, तो हर मामला दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

एफआईआर के बाद दोनों ने कर ली थी शादी

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद 27 अगस्त 2019 को दोनों पक्षों ने विवाह कर लिया था। कोर्ट ने कहा कि यह परिस्थिति भी इस संभावना की ओर संकेत करती है कि मुकदमा विवाह के लिए दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया हो सकता है।

न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के आधार पर प्रथम दृष्टया दुष्कर्म का मामला नहीं बनता। ऐसे में मुकदमे की कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

इसी आधार पर अदालत ने 8 जनवरी 2020 को दाखिल चार्जशीट, 4 सितंबर 2021 को जारी संज्ञान एवं समन आदेश तथा संबंधित आपराधिक मुकदमे की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

 

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया Vnation के Facebook पेज को LikeTwitter पर Follow करना न भूलें...
Leave A Reply

Your email address will not be published.