100 साल पुराने जख्म पर इजराइल का बड़ा दांव! आर्मेनियाई नरसंहार को मान्यता देने की तैयारी, तुर्किये से बढ़ सकता है टकराव

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यरुशलम: इजराइल ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे पश्चिम एशिया की राजनीति में नया विवाद खड़ा होने की आशंका बढ़ गई है। इजराइली कैबिनेट ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान आर्मेनियाई समुदाय के खिलाफ हुई हत्याओं को आधिकारिक तौर पर नरसंहार मानने संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि इस फैसले को अंतिम रूप मिलने के लिए संसद की स्वीकृति अभी बाकी है। माना जा रहा है कि यदि यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है तो इजराइल और तुर्किये के बीच पहले से मौजूद तनाव और गहरा सकता है।

क्या है पूरा मामला?

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ओटोमन साम्राज्य के शासनकाल में बड़ी संख्या में आर्मेनियाई लोगों की मौत हुई थी। आर्मेनिया और दुनिया के कई देश इसे सुनियोजित नरसंहार मानते हैं। इतिहासकारों के अनुसार उस दौर में करीब 15 लाख आर्मेनियाई नागरिकों की जान गई थी। इसे 20वीं सदी के सबसे बड़े मानवाधिकार संकटों में गिना जाता है।

दूसरी ओर तुर्किये लगातार इस दावे को खारिज करता रहा है। तुर्किये का कहना है कि मौतें युद्ध, बीमारी और गृह संघर्ष जैसी परिस्थितियों का परिणाम थीं, इसलिए इन्हें नरसंहार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

इजराइल ने अब क्यों बदला रुख?

कई दशकों तक इजराइल इस मुद्दे पर सावधानी बरतता रहा और उसने आर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी। इसकी एक बड़ी वजह तुर्किये के साथ उसके रणनीतिक और कूटनीतिक संबंध माने जाते थे।

लेकिन हाल के वर्षों में गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के बाद दोनों देशों के रिश्तों में लगातार गिरावट आई है। ऐसे माहौल में इजराइल का यह कदम सिर्फ ऐतिहासिक मान्यता तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

विदेश मंत्री ने बताया नैतिक जिम्मेदारी

इजराइल के विदेश मंत्री गिडियन सार ने कहा कि आर्मेनियाई लोगों के साथ हुई त्रासदी को लंबे समय तक नकारने और इतिहास को बदलने की कोशिश की गई। उनके मुताबिक, सही निर्णय लेने में कभी देर नहीं होती और यह एक नैतिक तथा ऐतिहासिक दायित्व है।

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका समेत कई देशों ने पहले ही इस घटना को नरसंहार के रूप में मान्यता दे रखी है। अब इस प्रस्ताव को संसद के सामने रखा जाएगा।

गाजा युद्ध के बीच बढ़ी चर्चा

इजराइल का यह फैसला ऐसे समय आया है जब वह खुद गाजा युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गंभीर आलोचनाओं का सामना कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने गाजा में सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता जताई है। वहीं इजराइल लगातार यह कहता रहा है कि उसकी कार्रवाई आतंकवादी संगठनों के खिलाफ है और वह जानबूझकर नागरिकों को निशाना नहीं बनाता।

क्या बढ़ेगा तुर्किये-इजराइल तनाव?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजराइली संसद भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है तो तुर्किये की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। दोनों देशों के रिश्ते पहले ही कई मुद्दों पर तनावपूर्ण हैं और यह फैसला कूटनीतिक संबंधों में नई खटास पैदा कर सकता है। आने वाले दिनों में संसद की प्रक्रिया और तुर्किये की प्रतिक्रिया पर दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी।

 

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