इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान आमने-सामने, 1979 के बाद पहली उच्चस्तरीय वार्ता; जानें अब तक क्या हुआ और आगे क्या संकेत

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मध्य-पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच अहम वार्ता शुरू हो गई है। इसे 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच पहली उच्च-स्तरीय आमने-सामने बातचीत माना जा रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जबकि ईरान की ओर से संसद के स्पीकर मोहम्मद बागैर गालिबफ बातचीत की अगुवाई कर रहे हैं।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में शुरू हुआ सीधा संवाद

वार्ता शुरू होने से पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों से अलग-अलग मुलाकात की। इसके बाद औपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

सूत्रों के मुताबिक, शुरुआती बातचीत सामान्य मुद्दों से आगे बढ़कर तकनीकी स्तर की चर्चाओं तक पहुंच चुकी है, हालांकि कई अहम मुद्दों पर अब भी मतभेद बरकरार हैं। विदेश मंत्रालय की ओर से बातचीत के बाद आधिकारिक बयान जारी किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

पहले दौर की बातचीत शांतिपूर्ण, दूसरे दौर की तैयारी

करीब पांच घंटे चली पहली बैठक को शांत और सौहार्दपूर्ण बताया जा रहा है। इस दौरान दोनों पक्षों ने साथ डिनर भी किया और अपने-अपने विचारों का आदान-प्रदान किया।

अब रविवार को दूसरे दौर की बातचीत प्रस्तावित है, जिसमें लंबित मुद्दों पर आगे चर्चा होगी।

‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ बना सबसे बड़ा अड़ंगा

सूत्रों के अनुसार, कई मुद्दों पर सहमति बनने के बावजूद ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई है।

यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम है, ऐसे में इस पर किसी भी तरह का विवाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकता है।

दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडल में शामिल बड़े चेहरे

अमेरिका की ओर से जेडी वेंस के साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर भी वार्ता में शामिल हैं। इसके अलावा सुरक्षा और एशियाई मामलों के विशेषज्ञों की टीम भी इस्लामाबाद में मौजूद है।

वहीं, ईरान की ओर से गालिबफ के साथ विदेश मंत्री अब्बास अरगची, सुप्रीम नेशनल डिफेंस काउंसिल के सचिव अली अकबर अहमदियन और केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दुल नासिर हेम्मती भी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं।

सीजफायर के बावजूद कायम है तनाव

चार दिन पहले दोनों देशों के बीच दो सप्ताह का युद्धविराम घोषित किया गया था, लेकिन लेबनान में इजरायली हमलों में 300 से ज्यादा लोगों की मौत के बाद हालात फिर तनावपूर्ण हो गए हैं।

ईरान ने इन हमलों को युद्धविराम का उल्लंघन बताया है, जबकि अमेरिका और इजरायल का कहना है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं था।

ईरान ने वार्ता के लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं, जिनमें लेबनान पर हमले रोकना और उसके फ्रीज किए गए फंड को जारी करना शामिल है। हालांकि इस पर दोनों पक्षों के दावों में मतभेद नजर आ रहा है।

होर्मुज से गुजरे अमेरिकी युद्धपोत, बढ़ी हलचल

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, उसके दो युद्धपोत—यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन और यूएसएस माइकल मर्फी—सुरक्षित रूप से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से गुजर चुके हैं।

अमेरिका का कहना है कि यह मिशन समुद्री मार्ग से बारूदी सुरंगों को हटाने और जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए चलाया जा रहा है।

पोप का शांति संदेश, युद्ध पर जताई चिंता

वार्ता के बीच वेटिकन से भी शांति की अपील सामने आई है। पोप लियो चौदहवें ने अपने संदेश में कहा कि दुनिया में अब बहुत लड़ाई हो चुकी है और ‘सर्वशक्तिमान होने का भ्रम’ संघर्ष को बढ़ावा दे रहा है।

उन्होंने वैश्विक नेताओं से शांति और मानवता को प्राथमिकता देने की अपील की।

बातचीत से पहले दोनों पक्षों की सख्त बयानबाजी

वार्ता से पहले ईरान के नेताओं ने अमेरिका पर भरोसे की कमी जताई थी, जबकि यह भी कहा था कि अगर ईमानदारी से बातचीत होती है तो समझौते की संभावना है।

दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से भी स्पष्ट किया गया कि वह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचेगा।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम, हाई अलर्ट पर इस्लामाबाद

इस ऐतिहासिक वार्ता को देखते हुए इस्लामाबाद में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। शहर में 10 हजार से ज्यादा सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है और रेड जोन को पूरी तरह सील कर दिया गया है।

केवल अधिकृत लोगों को ही प्रवेश की अनुमति दी जा रही है।

क्या हो सकता है आगे का रास्ता

विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक समीकरणों पर भी पड़ेगा।

अगर बातचीत सफल रहती है तो मध्य-पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव कम हो सकता है और शांति की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। वहीं, विफलता की स्थिति में हालात और बिगड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

 

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