वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच शुक्रवार को ओमान की राजधानी मस्कट में अहम वार्ता होने जा रही है, लेकिन बातचीत से पहले ही एजेंडे को लेकर दोनों देशों के रुख में गहरी खाई साफ दिखाई दे रही है। जहां वॉशिंगटन व्यापक मुद्दों पर चर्चा के पक्ष में है, वहीं तेहरान बातचीत को सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रखने पर अड़ा हुआ है।
एजेंडे पर मतभेद, मिसाइल कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद
अमेरिकी पक्ष ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को दिए जा रहे समर्थन और आंतरिक नीतियों जैसे विषयों को भी वार्ता में शामिल करना चाहता है। इसके उलट ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम किसी भी तरह की चर्चा का हिस्सा नहीं होगा और बातचीत केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित रहनी चाहिए।
तनावपूर्ण माहौल में हो रही है कूटनीतिक पहल
यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब मध्य-पूर्व में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों में इजाफा हुआ है और कई देशों को आशंका है कि किसी भी गलत कदम से हालात व्यापक युद्ध की ओर बढ़ सकते हैं। हाल के दिनों में वार्ता के स्थान और दायरे को लेकर असमंजस बना हुआ था, लेकिन अंततः इस्तांबुल की बजाय ओमान को बैठक स्थल चुना गया।
रुबियो के संकेत, तेहरान की दो-टूक
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिए हैं कि बातचीत को केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। वहीं ईरानी अधिकारियों ने दोहराया है कि मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय नीति उनके लिए ‘रेड लाइन’ है और इस पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
परमाणु कार्यक्रम पर आरोप-प्रत्यारोप जारी
ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। हालांकि अमेरिका और इजराइल पहले भी उस पर परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश का आरोप लगाते रहे हैं। यही मुद्दा दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव की जड़ बना हुआ है।
कौन-कौन हो सकता है वार्ता में शामिल
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकाफ और ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची वार्ता में शामिल हो सकते हैं। ईरान ने ओमान को इसलिए प्राथमिकता दी है क्योंकि इससे पहले भी यहां परमाणु मुद्दे पर सीमित दायरे में बातचीत हो चुकी है।
तेल बाजारों पर भी दिख रहा असर
पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ने, ड्रोन और नौसैनिक घटनाओं तथा आपसी धमकियों ने तनाव को और गहरा किया है। इन हालात के बीच किसी संभावित समझौते की उम्मीद और असफलता की आशंका से वैश्विक तेल बाजारों में भी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों की चेतावनी, संवाद फिर भी जारी रखने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर एजेंडे पर सहमति नहीं बन पाती है तो वार्ता पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं। इसके बावजूद दोनों पक्ष फिलहाल बातचीत के दरवाजे खुले रखने के संकेत दे रहे हैं, ताकि हालात को पूरी तरह बिगड़ने से रोका जा सके।