Chaitra Navratri 2026: खरमास और पंचक के बीच भी होगी घटस्थापना, जानिए पूजा का सही मुहूर्त और पूरी विधि
नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र का पावन पर्व इस वर्ष 19 मार्च 2026 से प्रारंभ हो रहा है। हिंदू धर्म में नवरात्र का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। इस बार नवरात्र की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब पंचांग के अनुसार खरमास और पंचक का संयोग बना हुआ है। सामान्य तौर पर इन दोनों स्थितियों को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता, इसलिए कई श्रद्धालुओं के मन में घटस्थापना और देवी पूजा को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। हालांकि धर्मग्रंथों और ज्योतिष विद्वानों के अनुसार देवी साधना और नवरात्र की पूजा पर इन दोषों का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
खरमास और पंचक के बीच घटस्थापना को लेकर क्या कहता है शास्त्र
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार खरमास और पंचक के दौरान मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा रही है, क्योंकि इस समय विवाह, गृह प्रवेश या अन्य बड़े शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। लेकिन देवी पूजन इन दोषों से मुक्त माना गया है। ऐसे में 19 मार्च को नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ की जा सकती है। इस वर्ष मां दुर्गा का आगमन डोली पर माना जा रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से इसे समाज में अस्थिरता, भय और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का संकेत भी माना जाता है। ऐसे समय में धैर्य, संयम और श्रद्धा के साथ की गई पूजा भक्तों को मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।
घटस्थापना के लिए ये हैं सबसे शुभ मुहूर्त
नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के लिए शुभ समय का विशेष महत्व होता है। 19 मार्च 2026 को कलश स्थापना के लिए दो प्रमुख शुभ मुहूर्त प्राप्त हो रहे हैं। प्रातः काल का शुभ समय सुबह 06 बजकर 09 मिनट से 08 बजकर 06 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में घटस्थापना करना अत्यंत शुभ माना जाता है और इससे घर में सुख-समृद्धि आने की मान्यता है। यदि किसी कारणवश सुबह पूजा संभव न हो सके तो अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापना की जा सकती है। यह समय दोपहर 11 बजकर 49 मिनट से 12 बजकर 38 मिनट तक रहेगा, जिसे भी पूजा के लिए शुभ माना गया है।
14 अप्रैल तक मांगलिक कार्यों पर रहेगी रोक
भले ही नवरात्र में घटस्थापना और देवी पूजन पूरी तरह मान्य है, लेकिन खरमास के प्रभाव के कारण अन्य बड़े मांगलिक कार्यों पर 14 अप्रैल 2026 तक रोक रहेगी। इस अवधि में विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत और गृह प्रवेश जैसे पारंपरिक शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय नई शुरुआत के बजाय भक्ति, साधना और आत्मचिंतन के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति नया व्यवसाय शुरू करने या संपत्ति से जुड़े बड़े निर्णय लेने की योजना बना रहा है, तो 14 अप्रैल के बाद का समय अधिक अनुकूल हो सकता है।