ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगातार बदलते रुख ने देश के भीतर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। कभी नाटो सहयोगियों से मदद की अपील और अगले ही पल उनकी जरूरत से इनकार—ट्रंप के विरोधाभासी बयान अब चर्चा और आलोचना का केंद्र बन गए हैं। तेहरान के ऊर्जा ढांचे पर हमले की धमकी देना और फिर अचानक उसे टाल देना, इस अस्थिर नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, ‘टैको’ हैशटैग ट्रेंड में
ट्रंप के फैसलों को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई यूजर्स “ट्रंप ऑलवेज चिकन्स आउट (टैको)” जैसे हैशटैग के जरिए उनका मजाक उड़ा रहे हैं। यह शब्द उन परिस्थितियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जब ट्रंप दबाव में अपने फैसलों से पीछे हटते नजर आते हैं।
मदद की अपील और फिर यू-टर्न
मार्च की शुरुआत में ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रखने के लिए यूरोपीय देशों और ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर अन्य राष्ट्रों से सहयोग मांगा था। उन्होंने कहा था कि जरूरत पड़ने पर सहयोगी देश तुरंत मदद के लिए आगे आएं।
हालांकि, इसी दौरान उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका को किसी की जरूरत नहीं है और उसकी सेना दुनिया में सबसे मजबूत है। इस दोहरे रुख ने सहयोगी देशों के बीच भी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी, जिसके चलते उनकी अपील को ठंडी प्रतिक्रिया मिली।
हमले की धमकी और फिर स्थगन
पिछले हफ्ते ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर 48 घंटे में होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोला गया तो अमेरिका उसके बिजली संयंत्रों को नष्ट कर देगा। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने बातचीत का हवाला देते हुए हमलों को पहले 5 दिनों और फिर 10 दिनों के लिए टाल दिया।
विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह रवैया अधिक आवेगी और भावनात्मक नजर आता है। विश्लेषकों के मुताबिक, स्पष्ट रणनीति के बजाय बार-बार बदलते बयान अमेरिका की वैश्विक छवि को प्रभावित कर रहे हैं और नीति को लेकर भ्रम की स्थिति बना रहे हैं।
अमेरिकी विश्वसनीयता पर भी सवाल
विदेश नीति विश्लेषकों ने भी इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की विश्वसनीयता कमजोर होती नजर आ रही है और यह स्थिति वैश्विक कूटनीति के लिए चुनौती बन सकती है।
जनता में भी बढ़ी असहमति
एक सर्वे के मुताबिक, करीब 61 प्रतिशत अमेरिकी ईरान के साथ युद्ध को लेकर ट्रंप के रवैये से असहमत हैं, जबकि 37 प्रतिशत लोग इस रुख का समर्थन करते हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि देश के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद गहराते जा रहे हैं।