नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026–27 में आर्थिक विकास और राजकोषीय अनुशासन को साथ लेकर चलते हुए सरकार की वित्तीय प्रतिबद्धताओं का खाका पेश किया। उन्होंने वित्त वर्ष 2025–26 के लिए राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4.4% निर्धारित होने की जानकारी दी।
राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और कुल राजस्व के बीच अंतर को दर्शाता है, जिसमें उधार शामिल नहीं होता, और इसका अधिकतर वित्तपोषण बाजार से लिए गए उधार के माध्यम से किया जाता है।
निर्मला सीतारमण ने बताया कि वित्त वर्ष 2026–27 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.3% तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है। यह धीरे-धीरे घाटा घटाने का लक्ष्य सरकार की उस रणनीति को उजागर करता है, जिसमें विकास या आवश्यक कल्याणकारी एवं अवसंरचना व्यय को नुकसान पहुँचाए बिना वित्तीय मजबूती सुनिश्चित की जा रही है।
वित्त मंत्री ने कहा कि घाटे में इस क्रमिक कमी से निवेशकों, रेटिंग एजेंसियों और वैश्विक बाजारों को भारत की सार्वजनिक वित्तीय स्थिरता का भरोसा मिलेगा। उन्होंने देश की ऋण स्थिति पर भी प्रकाश डालते हुए बताया कि भारत का ऋण-से-जीडीपी अनुपात घटकर 55.6% होने का अनुमान है।
ऋण-से-जीडीपी अनुपात किसी देश की ऋण चुकाने की क्षमता का प्रमुख सूचक है। गिरता हुआ अनुपात राजकोषीय मजबूती और बाहरी झटकों के प्रति अधिक लचीलेपन को दर्शाता है। कम अनुपात यह संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था सार्वजनिक ऋण संचय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है, जिससे उत्पादक सार्वजनिक निवेश के लिए पर्याप्त गुंजाइश उपलब्ध होती है।
राजकोषीय घाटे के लक्ष्य और जीडीपी अनुपात के मुकाबले ऋण में अनुमानित गिरावट, दोनों मिलकर अनुशासित और विकास-सहायक वित्तीय प्रबंधन की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं।