पूर्व भारतीय क्रिकेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने खोला क्रिकेट और जीवन का दर्द: रंगभेद, मानसिक संघर्ष और अकेलापन
भारत के पूर्व लेग स्पिनर और कमेंटेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने हाल ही में अपने करियर और निजी जीवन में झेली चुनौतियों और मानसिक संघर्ष का खुलासा किया। 1980 के दशक की शुरुआत में मात्र 17 साल की उम्र में भारतीय टीम में कदम रखने वाले शिवरामकृष्णन को न सिर्फ खेल में बल्कि जीवन में भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। किशोरावस्था में उन्हें ‘शराबी’ और ‘ड्रग एडिक्ट’ कहा गया और इसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ा। उन्होंने बताया कि उनके करियर के दौरान ऐसी परिस्थितियां आईं कि कोई अपनी बेटी उनकी शादी नहीं करना चाहता था।
शादी का एड भेजा, कोई जवाब नहीं आया
शिवरामकृष्णन ने साझा किया कि उनके माता-पिता ने एक शादी का एड भेजा, जिसमें उनके टेस्ट क्रिकेटर और संपत्ति मालिक होने का जिक्र था। इसके बावजूद दो हफ्ते बाद भी किसी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा, “इसका मतलब था कि लोगों ने मेरी प्रतिष्ठा इतनी खराब कर दी थी कि कोई अपनी बेटी की शादी मुझसे नहीं करना चाहता।”
चलती कार से कूदने तक के विचार आए मन में
भारतीय टीम से बाहर किए जाने और लगातार आलोचना के चलते शिवरामकृष्णन ने बताया कि वह अत्यधिक उदासी में थे। उन्होंने कहा, “1987 वर्ल्ड कप से घर लौटने के बाद सिलेक्टर्स ने मुझे बुलाया और अनफिट होने की बात प्रेस में बताने को कहा। मैंने मना कर दिया और कहा कि आप चाहें तो मुझे ड्रॉप कर दें। मैं पूरी तरह से उदास था। कभी-कभी दुबई में यात्रा करते समय, गाड़ी बहुत तेज़ चलती और मेरे मन में विचार आता कि बस दरवाजा खोलकर बाहर कूद जाऊं। लेकिन कुछ ऐसा था जो मुझे रोक देता।”
तनाव और मतिभ्रम का सामना
पूर्व स्पिनर ने आगे बताया कि मानसिक तनाव इतना बढ़ गया था कि उन्हें मतिभ्रम होने लगा। “आंखें बंद करने पर डरावनी तस्वीरें दिखाई देतीं, और जब खोलते तो कुछ नहीं होता। थकान इतनी होती कि बस सोना चाहते। हर बार खुद को और ज्यादा उलझा पाते थे और बाहर की दुनिया कह रही थी, ‘देखो, शराब की वजह से सब हुआ।’”
रंगभेद और कमेंट्री करियर का अंत
शिवरामकृष्णन ने बीसीसीआई कमेंट्री पैनल छोड़ने का कारण अवसरों की कमी और रंगभेद बताया। जब एक यूजर ने पूछा कि क्या उनकी त्वचा का रंग कोई मुद्दा है तो उन्होंने कहा, “आप सही हैं। रंगभेद।”