पत्नी की ट्रांसफर याचिका पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बोला—समानता का मतलब पुरुष की परेशानी को अनदेखा करना नहीं
नई दिल्ली। राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने एक अहम मामले में पत्नी की ट्रांसफर याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट टिप्पणी की है कि महिलाओं को पीड़ित मानना सही हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुषों की कठिनाइयों को नजरअंदाज कर दिया जाए। अदालत ने कहा कि न्याय का मूल सिद्धांत दोनों पक्षों को समान दृष्टि से देखना है।
सिंगल बेंच ने सुनाया संतुलित फैसला
यह निर्णय जस्टिस रेखा बोराणा की एकल पीठ ने सुनाया। जयपुर निवासी महिला ने सिविल ट्रांसफर एप्लीकेशन दाखिल कर तलाक मामले को बीकानेर से जयपुर स्थानांतरित करने की मांग की थी, जिसे अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खारिज कर दिया।
अदालत की टिप्पणी—पति को ज्यादा कठिनाई होती
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि पत्नी का आवेदन स्वीकार कर लिया जाता, तो पति को अधिक असुविधा होती। इसलिए समानता के सिद्धांत के तहत दोनों पक्षों की परिस्थितियों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है।
पति की दलील—बीमार मां और बुजुर्ग पिता की जिम्मेदारी
पति की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता उदयशंकर आचार्य ने बताया कि अदालत ने सभी तथ्यों पर विचार कर निर्णय दिया। पति ने दलील दी कि वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है, उसकी मां कैंसर से पीड़ित और बिस्तर पर है, जबकि पिता की उम्र 80 वर्ष से अधिक है। ऐसे में वह बार-बार जयपुर आकर मुकदमा लड़ने में असमर्थ है।
क्या था पत्नी का पक्ष
याचिकाकर्ता महिला ने कहा था कि वह वर्ष 2005 से अपने बच्चों के साथ जयपुर में रह रही है और यहीं नौकरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करती है। उसने यह भी बताया कि दोनों पक्षों से जुड़े अन्य मामले भी जयपुर में लंबित हैं, इसलिए तलाक का केस भी वहीं स्थानांतरित किया जाए। पति ने तलाक की अर्जी बीकानेर की फैमिली कोर्ट में दायर की है।
फैसले को बताया महत्वपूर्ण मिसाल
पति पक्ष के वकील ने इसे राज्य में अपने प्रकार का पहला फैसला बताते हुए कहा कि इसमें सिविल ट्रांसफर आवेदन पर सुनवाई के दौरान पति की परिस्थितियों को भी बराबर महत्व दिया गया है, जो न्यायिक संतुलन का उदाहरण है।