‘खेत बचाओ अभियान’ में किसानों को मिला प्राकृतिक खेती का मंत्र, जेवर में विधायक धीरेंद्र सिंह ने दिया बड़ा संदेश

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गौतमबुद्धनगर: भारत सरकार और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे राष्ट्रव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत जेवर ब्लॉक परिसर में प्राकृतिक खेती विषयक द्वितीय कृषक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना, मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण करना और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित करना रहा।

देशभर में 1 जून से 30 जून 2026 तक संचालित किए जा रहे इस अभियान के अंतर्गत आयोजित कार्यशाला में जेवर विधानसभा क्षेत्र के विधायक धीरेंद्र सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. विपिन कुमार, वैज्ञानिक डॉ. बोनिका पंत, डॉ. सुनील प्रजापति, उप कृषि निदेशक राजीव कुमार, खंड विकास अधिकारी अंकित कुमार सिंह सहित कृषि विभाग के अधिकारी, वैज्ञानिक और बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।

प्राकृतिक खेती को बताया भविष्य की जरूरत

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और स्वागत संबोधन के साथ हुआ। इसके बाद कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती की अवधारणा, उसके मूल सिद्धांतों और वर्तमान कृषि परिदृश्य में उसकी उपयोगिता पर विस्तार से जानकारी दी। विशेषज्ञों ने बताया कि प्राकृतिक खेती उत्पादन लागत कम करने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता बढ़ाने, जैव विविधता के संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

रासायनिक खेती के विकल्प के रूप में उभर रही प्राकृतिक खेती

अपने संबोधन में विधायक धीरेंद्र सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्राकृतिक खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकती है, बल्कि कृषि को दीर्घकालिक रूप से लाभकारी भी बना सकती है।

उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाने का आह्वान करते हुए भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन को रोकने और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।

किसानों को दिया गया व्यावहारिक प्रशिक्षण

कार्यशाला के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती के विभिन्न पहलुओं का व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया। इसमें बीज उपचार, जीवामृत निर्माण, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, फसल विविधीकरण, जैविक अपशिष्टों के उपयोग और प्राकृतिक कीट प्रबंधन तकनीकों की जानकारी दी गई। साथ ही किसानों को प्राकृतिक खेती के सफल मॉडल और उनके सकारात्मक परिणामों से भी अवगत कराया गया।

किसानों ने पूछे सवाल, विशेषज्ञों ने दिए समाधान

कार्यक्रम में शामिल किसानों ने प्राकृतिक खेती से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका कृषि विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक आधार पर विस्तार से समाधान प्रस्तुत किया। किसानों ने प्राकृतिक खेती को अपनाने और अपने गांवों में इसके प्रचार-प्रसार का संकल्प भी लिया।

कार्यक्रम के समापन पर सभी अतिथियों, किसानों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया। कृषि वैज्ञानिकों ने भविष्य में भी किसानों को प्राकृतिक खेती से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया।

उप कृषि निदेशक राजीव कुमार ने कहा कि यह कार्यशाला किसानों में प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण को प्रोत्साहित करने और टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि प्रणाली विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

 

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