ऑनलाइन गेम्स का बढ़ता प्रभाव : फरीदाबाद में रोज 100 से ज्यादा बच्चे मानसिक परेशानी के साथ पहुंच रहे अस्पताल

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फरीदाबाद : मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स बच्चों के बचपन पर भारी पड़ते जा रहे हैं। फरीदाबाद के सरकारी और निजी अस्पतालों में रोजाना 100 से अधिक बच्चे और किशोर ऐसे पहुंच रहे हैं, जो अत्यधिक गेमिंग की वजह से मानसिक और व्यवहारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। मनोचिकित्सकों ने इसे गंभीर चेतावनी मानते हुए अभिभावकों से सतर्क रहने की अपील की है।

शहर में ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, बीके अस्पताल सहित करीब 15 बड़े अस्पताल हैं, जहां गेमिंग की लत से जुड़े मामले लगातार सामने आ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार इन बच्चों में पढ़ाई में गिरावट, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और सामाजिक दूरी जैसी दिक्कतें आम हो गई हैं। कई मामलों में अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और आत्मघाती विचार तक देखे जा रहे हैं।

हाल ही में गाजियाबाद में मोबाइल पर कोरियन लव गेम के आदी तीन नाबालिग बहनों की घटना ने अभिभावकों को झकझोर कर रख दिया है। इसका असर फरीदाबाद में भी देखने को मिल रहा है, जहां बड़ी संख्या में बच्चे मोबाइल फोन और ऑनलाइन गेम्स की गिरफ्त में आते जा रहे हैं।

ग्रेटर फरीदाबाद स्थित एकॉर्ड अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. सिमरन मलिक का कहना है कि डिजिटल गेम्स में जीत-हार बच्चों के मन पर गहरा असर डालती है। बार-बार हारने पर उनका आत्मविश्वास कमजोर होता है और वे खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से कटने लगते हैं।

उन्होंने बताया कि मोबाइल या गेम्स को पूरी तरह बंद कर देना समाधान नहीं है, बल्कि उनके उपयोग की स्पष्ट समय-सीमा तय करना जरूरी है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों से रोज बातचीत करें, उनके साथ समय बिताएं और खेल-कूद व रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करें। यदि बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव नजर आए तो तुरंत मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।

ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. अंकुर सचदेवा ने बताया कि डिजिटल गेम्स की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। अस्पताल में हर महीने 5 से 6 बच्चे और किशोर मानसिक परेशानी के इलाज के लिए आते हैं, जिनमें से करीब दो बच्चे मोबाइल और गेम्स की अत्यधिक लत से प्रभावित होते हैं।

लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन, ध्यान की कमी और नींद व खानपान का असंतुलन देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बच्चे अपनी परेशानी अक्सर शब्दों में नहीं बता पाते, बल्कि उनके व्यवहार में बदलाव इसके संकेत होते हैं—जैसे अचानक चुप रहना, अकेले रहना पसंद करना, दोस्तों से दूरी बनाना या छोटी बातों पर गुस्सा होना।

क्या करें अभिभावक?

बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करें और उसका सख्ती से पालन कराएं

मोबाइल उपयोग को लेकर खुला संवाद बनाए रखें

आउटडोर खेल, हॉबी और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दें

बेडरूम और खाने की मेज को स्क्रीन-फ्री जोन बनाएं

पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स और सुरक्षित ब्राउजिंग का इस्तेमाल करें

नींद, व्यवहार या पढ़ाई में बदलाव दिखे तो तुरंत ध्यान दें

जरूरत पड़ने पर काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें

खुद डिजिटल अनुशासन अपनाकर उदाहरण पेश करें

क्या न करें?

बच्चों को लंबे समय तक बिना निगरानी मोबाइल न दें

रोने या जिद पर मोबाइल देकर चुप कराने की आदत न डालें

देर रात तक गेम खेलने या इंटरनेट इस्तेमाल की अनुमति न दें

बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को नजरअंदाज न करें

अचानक मोबाइल छीनने या सख्त पाबंदी लगाने से बचें

चिड़चिड़ापन, गुस्सा और सामाजिक दूरी जैसे संकेतों को हल्के में न लें

पढ़ाई में गिरावट को सामान्य मानकर अनदेखा न करें

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