लंबे समय तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका की नेतृत्व वाली प्रणाली रही है, लेकिन अब बड़ी आर्थिक शक्तियाँ अपनी अलग रणनीति अपनाते हुए क्षेत्रीय और द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से मार्गदर्शन कर रही हैं। भारत और यूरोपीय संघ के बीच लगभग 18 साल बाद सम्पन्न मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलाव का स्पष्ट उदाहरण है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम न केवल व्यापारिक सहयोग को बढ़ाएगा बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन में अमेरिका पर निर्भरता को भी कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है।
यह समझौता केवल भारत–ईयू संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव अमेरिका–भारत व्यापार वार्ता, अमेरिकी टैरिफ नीतियों और बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी देखा जा सकता है। भारत और यूरोपीय संघ ने इस मुक्त व्यापार समझौते के तहत अपने-अपने आयात पर चरणबद्ध तरीके से टैरिफ हटाने का प्रस्ताव रखा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे भारत को यूरोप के स्थिर और विशाल बाजार तक आसान पहुंच मिलेगी, वहीं यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार में निवेश और निर्यात के नए अवसर मिलेंगे। विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता भारत की सक्रिय व्यापार नीति और ईयू की रणनीतिक विविधीकरण नीति का परिणाम है, जो दोनों पक्षों के लिए आर्थिक और रणनीतिक लाभ सुनिश्चित करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईयू–भारत मुक्त व्यापार समझौता अमेरिका और भारत के बीच व्यापार वार्ता को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वॉशिंगटन में यह बढ़ती धारणा है कि यदि अमेरिका भारत के साथ व्यापक और ठोस समझौता नहीं करता, तो नई उभरती वैश्विक व्यापार संरचना में उसकी रणनीतिक पकड़ कमजोर पड़ सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में, भारत की यूरोप के साथ बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी अमेरिका के लिए एक संकेत के रूप में देखी जा रही है, जो उसे भारत के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत लगभग दो दशक तक ठहरी रही थी, जिसमें कृषि, ऑटोमोबाइल, टैरिफ संरचना और नियामकीय अंतर मुख्य बाधाएं बनीं। 2024 में भारत और ईयू के बीच वस्तुओं का व्यापार 142.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो भारत के कुल व्यापार का 11.5% बनाता है, फिर भी उस समय कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया। इस बार परिस्थितियां बदल गईं क्योंकि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी टैरिफ नीतियों ने देशों को यह एहसास दिलाया कि वे केवल एक आर्थिक शक्ति पर निर्भर नहीं रह सकते। विशेषज्ञों का कहना है कि इसी नई रणनीतिक चेतना ने भारत और ईयू को आपसी समझौते की दिशा में निर्णायक कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने वैश्विक व्यापार पर गहरा प्रभाव डाला है। टैरिफ अब केवल सौदेबाजी का साधन नहीं रहे, बल्कि दबाव और दंड के उपकरण के रूप में भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत पर 50 प्रतिशत तक के अमेरिकी टैरिफ लगाए गए, जिनमें रूस से तेल की खरीद बंद न करने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। यूरोपीय संघ भी इस दबाव से अछूता नहीं रहा, चाहे वह व्यापारिक टैरिफ हों या ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक मुद्दों पर कड़ी चेतावनियां। बीबीसी और सीएनबीसी के विश्लेषण बताते हैं कि इस वैश्विक अस्थिरता और अनिश्चितता ने भारत और ईयू को अपने व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों को तेजी से मजबूत करने के लिए प्रेरित किया।
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