ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जब किसी सीरीज का पहला सीजन हिट हो जाता है, तो उसके दूसरे सीजन से उम्मीदें काफी बढ़ जाती हैं। कई बार ये उम्मीदें टूटती हैं, लेकिन ‘मामला लीगल है’ का दूसरा सीजन इस ट्रेंड को तोड़ता नजर आता है। यह सीरीज न सिर्फ पहले सीजन की सफलता को आगे बढ़ाती है, बल्कि अपने अलग अंदाज में कोर्टरूम ड्रामा को मनोरंजक और दिलचस्प बनाकर पेश करती है। जजों की जिंदगी के अनदेखे पहलुओं को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाना इसकी सबसे बड़ी खासियत बनकर उभरता है।
कहानी में नए मोड़ और दिलचस्प केस
इस सीजन में वीडी त्यागी के किरदार में रवि किशन अब जज की कुर्सी संभाल चुके हैं और उनके सामने नए-नए केस और चुनौतियां आती हैं। मिंटू जी और वीनू जी अब उनके चेंबर का हिस्सा बन चुके हैं, और दोनों के बीच एक अलग तरह का रिश्ता भी विकसित होता दिखता है। वहीं नायला एक ईमानदार वकील के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश करती नजर आती हैं। हर एपिसोड में अलग-अलग केस दिखाए गए हैं, जिनके जरिए जज और वकील की कार्यप्रणाली को रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।
सीरीज का ट्रीटमेंट बनाता है खास
अब तक फिल्मों और वेब सीरीज में जजों को सीमित दायरे में ही दिखाया गया है, लेकिन इस सीरीज में उनके व्यक्तित्व और पेशे के मानवीय पहलुओं को विस्तार से दिखाया गया है। क्या जज मुस्कुरा नहीं सकते? क्या उन्हें हर वक्त सख्त ही रहना होता है? इन सवालों के जवाब सीरीज बड़े सहज और मनोरंजक तरीके से देती है। कई केस वास्तविक घटनाओं से प्रेरित लगते हैं, जो दर्शकों को जानकारी देने के साथ-साथ एंटरटेन भी करते हैं।
करीब 30-35 मिनट के 8 एपिसोड वाली यह सीरीज कहीं भी बोरियत महसूस नहीं होने देती। हर एपिसोड में नया केस और नया एंगल दर्शकों को बांधे रखता है। कोर्ट के माहौल को भी काफी वास्तविक तरीके से पेश किया गया है, जिससे कहानी और ज्यादा प्रभावशाली बनती है।
अभिनय में सभी कलाकारों ने डाला जान
रवि किशन ने जज के किरदार में एक बार फिर दमदार प्रदर्शन किया है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और एक्सप्रेशंस इतने सहज हैं कि वह पूरी तरह इस भूमिका में ढले नजर आते हैं। नायला ग्रेवाल ने एक नई वकील के रूप में संतुलित और प्रभावी अभिनय किया है।
निरहुआ का किरदार हल्के-फुल्के अंदाज में मनोरंजन बढ़ाता है। अनंत जोशी, अंजुम बत्रा और निधि बिष्ट जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों को मजबूती से निभाया है। कुशा कपिला का रोल सीमित जरूर है, लेकिन वह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रहती हैं। सहायक कलाकारों की टीम भी सीरीज को मजबूती देती है।
राइटिंग और डायरेक्शन में संतुलन
सीरीज की कहानी को कुणाल, सैयद शादान, मोहक अनेजा और तत्सत पांडे ने मिलकर लिखा है, जबकि निर्देशन राहुल पांडे का है। लेखन की खास बात यह है कि हर एपिसोड में नए केस के साथ मनोरंजन का संतुलन बनाए रखा गया है। डायरेक्शन भी कहानी के टोन के अनुरूप सधा हुआ है, जिससे सीरीज का फ्लो बना रहता है।
देखें या नहीं?
अगर आप हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किए गए कोर्टरूम ड्रामा के शौकीन हैं, तो यह सीरीज आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। इसे आप परिवार के साथ भी आराम से देख सकते हैं।
रेटिंग: 3.5/5